नही चेता उत्तर प्रदेश के परिवहन मंत्री के जिले का विभाग


नही चेता उत्तर प्रदेश के परिवहन मंत्री के जिले का विभाग
पूरे दिन मासूमों की जान को जोखिम में डालने का जारी रहा कृत्य
दस बीस की जान शायद चली जाय तो शायद जाग जाय प्रशासन
आजमगढ़। सूब के परिवहन मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव के जिले का परिवहन विभाग  मऊ हादसे के बाद भी  नहीं चेता। सुबह से लेकर शाम तक अवैध स्कूली वाहन बच्चों की जान जोखिम में डालने का दुष्कृत्य करते रहें। शायद आजमगढ़ के प्रशासन को मऊ से भी  बड़ी घटना का इंतजार है। जनपद के परिवहन विभाग  की कुम्भकर्णी निद्रा इतनी बड़ी घटना के बाद नहीं टूटी। विभाग  में दलालों का खेल जारी रहा। निर्मोही अधिकारियों के माथे पर शिकन तक नही रही। न तो कोई कार्रवाई हुई और न ही किसी कार्रवाई का असर दिखा।
मऊ में  स्कूली वैन में ठूस कर ले जाये जा रहे स्कूली बच्चों की मानव रहित क्रासिंग पर ट्रेन से टकराने की घटना के बाद सूबे के परिवहन मंत्री राज्य सरकार के निर्देश पर मऊ पहुंचने वाले मंत्रियों मे सबसे पहले सदस्य रहे। पड़ोसी जनपद का निवासी होने के कारण नैतिकता की वजह से वह अपनी संवेदना व्यक्त करने पहुंचे। परिवहन मंत्री के मऊ जाने व दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का जुमले का मजाक खुद उनके विभाग  के अधिकारी ही उड़ाने में मशगूल हैं। मऊ मे हुई दुर्घटना के बाद यह कयास लगाये जा रहे थे कि शुक्रवार को जब स्कूल खुलेंगें तो शायद स्कूली बच्चों की परिवहन व्यवस्था कुछ बदली -बदली नजर आये। परिवहन विभाग  के जिम्मेदार अधिकारी सड़कों पर नजर आये और दुर्घटना का कारण बनने वाले अवैध स्कूली वाहनों पर कुछ कार्रवाई हो । लेकिन ऐसा कुछ भी  नही हुआ। परिवहन मंत्री के जिले के परिवहन विभाग  के अधिकारियों को शायद यह भान था कि .. .. सैयां  भये कोतवाल अब डर काहें का ! अधिकारियों की संवेदनहीनता का यह आलम  रहा कि स्कूल प्रबंधन अपनी परिवहन व्यवस्था को टटोलने के बजाय वैन, मैजिक, डग्गामार जीप, आटो रिक्शा से मासूमों को स्कूल ले आने ले जाने के अपने खेल में मस्त दिखे। कोई प्रशासनिक अधिकारी  इस बाबत रेंगता नजर नही आया कि मासूमों की जान को जोखिम में डालने वाले स्कूल प्रबंधकों को चेतावनी ही भेज दे। माननीय उच्चतम न्यायालय का स्कूली बच्चों के परिवहन का मानक ताक पर ही रहा।  जनपद का एक सम्मानित विद्यालय के सैकड़ों बच्चों आटो रिक्शा में  लद कर अपने घरों को जाते दिखे। वह भी आटो रिक्शा में इस कदर ठूंसे नजर आये कि अगर कोई दुर्घटना हो जाय तो जान जानी तय मानी जाय। नोट छापने की मशीन बने इन विद्यालयों के प्रबंधन के खिलाफ कोई कार्रवाई होगी या फिर  यह मासूमों की जान को जोखिम में डाल अपनी जेबें यूं ही भ रते ही रहेंगें। देखना है कि जनपद का जिला प्रशासन कब चेतता है और मासूमों की जान से खिलवाड़ कब रुकता है?

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