हवा में उड़ गई लिंगदोह समिति की सिफारिशें!

हवा में उड़ गई लिंगदोह समिति की सिफारिशें!
स्थानीय दखलदांजी ने किया छात्र राजनीति का बंटाधार
पावर और मनी का खेल बनी स्टूडेंट पालीटिक्स
पानी की तरह बहा रहे पैसा अन्य पार्टियों का मिल रहा सहयोग
प्रचार को दौड़ रही लक्जरी गाड़ियां, बाइक जुलूस से दिखा रहे हनक
आजमगढ़। उम्मीदवार सिर्फ 5000 रूपए तक ही खर्च कर सकता है। उम्मीदवार को चुनाव बाद दो सप्ताह के भीतर चुनाव अधिकारी को खर्च के अंकेक्षित लेखे प्रस्तुत करने होगेंं। अधिक खर्च पाए जाने पर उम्मीदवार का चुनाव रद्द किए जाने का प्रावधान। चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार या उनके संगठन राजनीतिक दलों से चन्दा नहीं ले सकते। चुनावों में प्रचार के लिए हाथ से बनाए गए पोस्टर ही काम में लिए जा सकते हैं, छपे हुए नहीं। इनका उपयोग भी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय द्वारा अधिसूचित स्थानों पर ही उपयोग हो सकेगा। चुनाव के प्रचार में लाउडस्पीकर या वाहनों का उपयोग नहीं हो सकता। विश्वविद्यालय या महाविद्यालय के बाहर कोई भी  उम्मीदवार रैलियां या सभा  नहीं कर सकता। शिक्षण संस्थान के बाहर प्रचार सामग्री •ाी वितरित नहीं की जा सकती। विश्वविद्यालय या महाविद्यालय में रैली या सभा के लिए भी  सम्बंधित संस्था प्रशासन की पूर्व अनुमति लेनी होगी।  छात्रसंघ चुनावों का कोई भी  उम्मीदवार ऐसी किसी प्रक्रिया या गतिविधि में लिप्त न हों, जिससे जाति, धर्म, सम्प्रदायों के बीच आपसी वैमनस्य उत्पन्न हो। दूसरे उम्मीदवारों की सिर्फ नीतियों या कार्यक्रमों की ही आलोचना की जा सकती है। निजी जीवन सम्बन्धी आलोचना नहीं की जा सकती। 
ये कुछ मुख्य  सिफारिशें थी जिसे भारत के पूर्व  मुख्य चुनाव आयुक्त जेम्स माइकल लिंगदोह ने की थी। लेकिन यह तश्वीर यह दर्शा रही है कि लिंगदोह समिति की सिफारिशें चुनावी पर्चे बनकर हवा में उड़ गई हैं। कालेज व यूनीवर्सिटी कैंपस में राजनीति के पीछे यह उद्देश्य था कि देश के लिए अच्छे राजनेता पैदा हों। लिंगदोह समिति की सिफारिशें इन तथ्यों को ध्यान में रखकर बनी हुई थी कि छात्र राजनीति का अपराधीकरण न हो और न ही कुर्सी पाने के चक्कर में छात्र ऐसे किसी क्रिया कलाप या गतिविधियों का हिस्सा बनें जिनके रास्ते अपराध की गंदी दहलीज से होकर निकलते हों। वर्तमान में जनपद की छात्र राजनीति का •ाविष्य उज्जवल नजर नहीं आ रहा है। फर्राटा भरते मोटर बाइकों पर नामांकन के दिन जुलूस निकालना और कन्वेसिंग के लिए लग्जरी गाड़ियों से छात्र राजनीति के प्रत्याशियों का दौड़ना यह बता रहा है कि सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। समिति की सिफारिशों पर गौर करें तो इस चुनाव में खर्च की अधिकतम सीमा महज पांच हजार रुपये रखी गयी थी। केवल तस्वीरों को देखें तो पांच क्या 50सों हजार के केवल चुनावी पर्चे हवा में उड़ा दिये गये हैं। इस छात्र राजनीति में सत्ताधारी दल और विपक्ष का हस्तक्षेप इस कदर बढ़ा है कि अब यह चुनाव प्रतिष्ठा के प्रश्न बनते जा रहे हैं। धन बल, बाहुबल का इस्तेमाल  देश की राजनीति के लिए अच्छे राजनेता गढ़ने के सपने को धूमिल कर रहा है। खेद तो तब होता है जब लिंगदोह समिति की सिफारिशों का खुला उल्लंघन देखते हुए भी  प्रशासन चुप्पी साधे रहता है। कानून तोड़ने वाले अपना काम करते रहते हैं। एक सर्वे के मुताबिक छात्र संघ के चुनाव आते ही छिनैती व लूट की घटनाओं में इजाफा दर्ज किया जाता है। कहीं यह देश के युवा शक्ति के बहकने का संदेश तो नहीं है? अगर जिले के आला हाकिम तथा इस चुनाव का संचालन कराने वाले महाविद्यालय प्रशासन अपने दायित्वों का बोध करते हुए नहीं चेतते हैं तो आम चुनाव की तरह कालेज के पवित्र कैंपस राजनीति के अखाड़े में तब्दील हो जायेंगे और ज्ञानार्जन का पवित्र उद्देश्य समाप्त हो जायेगा। 





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