. ..सब सजा उसके लिए जिसकी खता कुछ भी नही


            दौर ऐसा आ गया कातिल की सजा कुछ  भी नही
            सब सजा उसके लिए जिसकी खता कुछ  भी नही
मऊ जनपद के खुरहट में हुए ट्रेन से स्कूली वैन के टक्कर के हादसे ने एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर इन हादसों का असल जिम्मेदार कौन है? जिन घरों के चिराग बुझे हैं और जो दिये रौशनी बिखरने के लिए अपनी जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं उनको इस हालत में पहुंचाने का असली गुनाहगार कौन है? मानव रहित क्रासिंग, ईयर फोन, स्कूल प्रबंधन, परिवहन विभाग ,शिक्षा  विभाग या फिर जिला प्रशासन जिसके नाक के नीचे मासूमों की जान का सौदा किया जाता है किसे जिम्मेदार माना जाय। मुआवजे की रकम तो घायल बच्चों की इलाज पर ही खर्च हो जायेगी लेकिन जिनके घर के चिराग बुझे हैं क्या  मुआवजे की रकम उन घरों को रौशन कर पायेगी?
पूरे प्रदेश में ऐसे लाखो अवैध स्कूल चल रहे हैं  जो मासूमों को मौत की सवारी करने को मजबूर करते हैं। स्कूल अगर अवैध न हो तो भी  उनकी बच्चों को ले आने ले जाने की परिवहन व्यवस्था पूरी तरह अवैध और गैर जिम्मेदाराना रवैया अख्तियार करते हुए बार-  बार मासूमों को मौत के मुंह में धकेलने का प्रयास करती है। जनपद आजमगढ़ में भी  बिलरियागंज के नसीरुद्दीनपुर मे भी  ऐसा ही एक हादसा हुआ था। ऐसे ही एक  स्कूली बच्चों को ले जाने वाली वैन जो घरेलू सिलेंडर से चलाई जाती थी में आग पकड़ लेती है। वैन का ड्राइवर वैन में 14 बच्चों को जलता हुआ छोड़ भाग निकलता है। ऐसे में उसी वैन में सवार एक लड़के ओमप्रकाश ने अपनी जान पर खेलकर सभी  मासूमों की जान बचाई थी लेकिन खुद इतना जल गया कि आज •ाी वह अपाहिजों की जिंदगी जिने को मजबूर है। ओम प्रकाश को संजय चोपड़ा पुरस्कार भी  प्रदान किया गया। लेकिन वही बात की मुआवजों व पुरस्कारों से काम नही चलता, ओमप्रकाश के पिता अपने कलेजे के टुकड़े का आज तक इलाज करवा रहे हैं। अब तो उनके पास इलाज के  पैसे तक नही रह गये हैं। सड़कों पर धड़ल्ले से दौड़ते अवैध स्कूली वाहनों को लेकर न तो जिला प्रशासन अपनी जिम्मेदारी समझता है और न ही परिवहन  विभाग और न ही शिक्षा  विभाग । क्या  परिवहन  विभाग की जिम्मेदारी नही बनती है वह ऐसे अवैध स्कूली वाहनों के संचालन को रोकें जो सुप्रीम कोर्ट के मानकों से ईतर सड़कों पर चल रही हैं। आखिर प्रदेश के परिवहन विभाग से कोई यह पूछना चाहेगा कि आखिर कैसे एक छोटे स्कूली वैन में डेढ़ दर्जन से अधिक स्कूली बच्चों को  भेड़  बकरियों की तरह ठूंस दिया गया था। प्रदेश सरकार की ओर से सबसे पहले पहुंचने वाले परिवहन मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव क्या अपनी जिम्मेदारी से बच पायेंगें। क्या प्रदेश का परिवहन  विभाग जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करेगा? परिवहन   विभाग के आला अधिकारियों  विभाग इस हादसे के प्रति उतने ही जिम्मेदार हैं जितना कि शिक्षा  विभाग। मौके पर पहुंचे प्रदेश के बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री वसीम अहमद क्या दर्द छटपटाते मासूमों के आखों में तैरते इस सवाल का जवाब दे पायेंगें कि आखिर उनका कसूर क्या था? कैसे स्कू ल संचालक एक वैन को जो स्कूली वाहन के रुप में चलाये जाने के लिए पूरी तरह  से अवैध था से बच्चों को ले आने ले जाने की अनुमति प्रदान कर दी? क्या  उस स्कूल की मान्यता खत्म की जायेगी। क्या उसके प्रबंधक के खिलाफ छह मासूमों की हत्या का मुकदमा चलाया जायेगा? ईयर फोन लगाकर ड्राइविंग करने वाले चालक ने न जाने कितनों बच्चों की जान जोखिम में डाल दिया ऐसे गैर जिम्मेदार चालक को काम पर रखने वाले स्कू ल के जिम्मेदार क्या अपनी जिम्मेदारियों से बच पायेंगें? पैसे की हवस के मारे स्कूल प्रबंधक ऐसे वाहनों को स्कूली वाहन के रुप में कब तक इस्तेमाल करेगें जो अवैध हैं। परिवहन  विभाग, शिक्षा विभागको हांकने वाला जिला प्रशासन कब तक  दुर्घटनाये होने के बाद ही चेतेगा। देश के रेल मंत्री  भले ही  सदन में बयान देकर मुआवजे आदि की घोषणा कर दें लेकिन जिन घरों के मासूम रुखसत हुए हैं उन जख्म  शायद इस जिंदगी में न भरे। किसी आदमी पैसे कमाने की हवस के शिकार हुए घर से हंसते मुस्कराते निकले इन बच्चों के अभिभावकों के आखों में तैरते आंसू को देख बस यही लगता रहा कि .. सब सजा उसके लिए जिसकी खता कुछ भी
 नही।

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