.. घर नही आये बलम कहां रैन बिताये


.. घर नही आये बलम कहां रैन बिताये
नही सुनाई देती परम्परागत फगुआ के बोल

आजमगढ़। आम के अमराईयों की फिजा में तैरती खुशबू, पेड़ से गिरते पत्ते व नये के आने की आहट, खेतों मे छाई पियराई के बीच फागुन मास के आगमन के साथ गूजने वाले फगुआ व चौताल के बोल अब गायब हो गये हैं। विलुत्प होती परम्पराआें को सहेजने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर हैं उन्हे इनकी मिठास तक का आभास नही है।
शिवरात्रि के पर्व के साथ गांवों के ढोल व मजीरे की थाप सुनाई देने लगती थी। गांव के अड़ी बाजों की टोली निकल पड़ती थी । क्या अमीर क्या गरीब सबके घर होली  के गीत के बोल होली से पहले ही लोगों के अर्न्तमन को सराबोर कर देते थे।  परम्परागत फगुआ के बोल कानों में रस घोलने लगते थे।  ..करवट देत लेत मुख चूमत थिर होई जात उताने बलम के कोरवां लपटाने  .. .. .. .. .. भोरवें घर नही आये बलम कहां रैन बिताये.. .. .. चार महिना गड़कले, चार महीना टपकेला नही आये पिया मोर मरल यौवनवा पर पाला पिया नही आये मोर.. .. ..
जैसे श्रृगांरिक गीतों के साथ ही बोल बोले जाते थे जो कवित्त से भरे होते थे। कवित्त के माध्यम से गायकों की टोलियों में सवाल-जवाब होता था। साहित्य से भरे इन कवित्त के बोलों में संस्कार के साथ समाज के ताने बाने जुड़े होते थे। विकास की अंधी दौड़ ने बड़ी तेजी से हमारी परम्पराओं पर डाका डाला है। अब होली के दिन फूहड़ गीतों पर तेज आवाज में बजते डीजे की धून पर शराब पीकर मस्त युवाओं की टोली नाचती नजर आ जाती है। पहले पूरे दिन का काम निपटनो के बाद शाम को मस्तों की टोली निकलती थी  जो किसी ने किसी के घर अपनी डेरा डालती व लोक रीतियों से जुड़े बोलों को कवित्त में पिरोकर हारमोनियम, झाल व ढोल के साथ जब प्रस्तुत करती तो अंर्तमन बिना रंग के ही सराबोर हो जाता था। देर रात तक चलने वाले इन अड़ियों से समाज में एकरूपता आती थी। होली के दिन तो सुबह ही मस्तों की  टोली निकलती पूरे गांव में हर घर पर जाकर एक- दो दोहे ढोलक की थाप पर बोलकर पूरी टोली रे फिर देख देख हा हा.. ..   के साथ जोगिरा सारारारा ..सारारा बोल बधाई देती  नजर आ जाती । आधुनिकता की चंकाचौध में परम्परायें छूटीं तो लोगों के घरों के दरवाजे भी  रंग के डर से बंद होने लगे। अब होली के दिन शराब होती है,दरवाजा बंद होता है, घर में टीवी चलती है, शाम को मिलना जुलने की औपचारिकता निभा  ली जाती है।

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