राहुल सांकृत्यायन, कैफी आजमी, अल्लामा शिबली नोमानी, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की गंगे जमुनी तहजीब वाली धरती आजमगढ़ में बेरोजगारी आजादी के बाद से ही यहां के लोगों को परदेस का मूंह ताकने को मजबूर करती रही है। ऐसे ही मजबूरी थी मनोज के पिता की  इसी मजबूरी की वजह से उन्होने  सपनों की दुनिया मुम्बई का साठ के दशक में रुख किया । इसी के साथ मनोज का बचपन भी  सगड़ी तहसील के भरौली गांव व ननिहाल गोड़ारी गांव के आम के बगीचों से होता हुआ पहुंच गया था मुम्बई। मुम्बई से मनोज के शरीर को गढ़ा लेकिन उसमें आत्मा डाल दी आजमगढ़ की। यही वह कारण है जिसकी वजह से मनोज के गीतों में आजमगढ़ की तहजीब, रवायत, संस्कृति व सोच की झलक मिल जाती है। आज भी  मनोज को अपने गांव की सोधीं महक खींच ही लाती है। 

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