राहुल सांकृत्यायन, कैफी आजमी, अल्लामा शिबली नोमानी, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की गंगे जमुनी तहजीब वाली धरती आजमगढ़ में बेरोजगारी आजादी के बाद से ही यहां के लोगों को परदेस का मूंह ताकने को मजबूर करती रही है। ऐसे ही मजबूरी थी मनोज के पिता की इसी मजबूरी की वजह से उन्होने सपनों की दुनिया मुम्बई का साठ के दशक में रुख किया । इसी के साथ मनोज का बचपन भी सगड़ी तहसील के भरौली गांव व ननिहाल गोड़ारी गांव के आम के बगीचों से होता हुआ पहुंच गया था मुम्बई। मुम्बई से मनोज के शरीर को गढ़ा लेकिन उसमें आत्मा डाल दी आजमगढ़ की। यही वह कारण है जिसकी वजह से मनोज के गीतों में आजमगढ़ की तहजीब, रवायत, संस्कृति व सोच की झलक मिल जाती है। आज भी मनोज को अपने गांव की सोधीं महक खींच ही लाती है।
मुझे तो आखिरी घर तक दिया जलाना है
बदलाव इस विद्यालय के आगे कॉन्वेंट भी शर्माते हैं बासूपार बनकट का प्राथमिक विद्यालय बना रोल माडल प्रधान व प्रधानाध्यापक ने मिलकर बदली सूरत प्रदीप तिवारी आजमगढ़। किसी की जिद और अपने लक्ष्य के प्रति जुनून क्या कुछ नही करवा सकता यह एहसास होता है उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद के एक स्कूल प्राथमिक विद्यालय बासूपार बनकट को देखकर। गांव की महिला प्रधान व उनके पति तथा विद्यालय के प्रधानाध्यापक सहित पूरे स्टाफ ने कायाकल्प नही पूरे विद्यालय की काया ही पलट कर दी, जिसे देखते ही हर कोई कह उठता है साहब ! इस स्कूल ने तो कान्वेंट विद्यालयों को पीछे छोड़ दिया है। सगड़ी तहसील के मुख्यालय से लगभग 1 किलोमीटर के अंदर ही बासूपार गांव की सरहद शुरू हो जाती है लेकिन यह गांव अपने बुनियादी विकास से कोसो दूर था। पूरे गांव की आबादी लगभग 200 घरों की है, बहुतायत मुस्लिम और अनुसूचित जाति के परिवार हैं। आज से तीन साल पहले की बात करें तो गांव के हर घर के बाहर एक छोटा गड्ढा होता था जिसमें घर का गंदा पानी इकट्ठा होता था और लोग उसे रोज उलीचा करते थे। पूरा गांव गंदगी से जूझता हुआ जल निकासी की समस्या से बजबजाता रहत...
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