जामुन के वे बेर
एक रोज मनीष की पढ़ाई की मेज पर किसी ने स्नेह भरे जामुनों का एक डलिया लाकर रख दिया, जामुनों का जो स्वाद था सो था ही लेकिन देने वाले के अपनत्व ने मनीष का दिल जीत लिया। जब तक वह पढ़ता रहा जामुनों का स्वाद लेता रहा। जामुन देने वाले को यह देखकर शायद खुशी हुई कि उसकी लाई हुई चीज मनीष को पसंद आई। जामुुन मनीष को पसंद है यह समझ अगले दिन जामुन लाने वाला उसी डलिया में पिछले दिन से ज्यादा जामुन लेकर आया। मनीष ने आज बहुत नोटिस तो नही किया लेकिन उसने जामुनों को बड़े ही जतन से रखवा दिया कि जब उसे फुरसत में आराम से खायेगा। दोपहर बीता जब मनीष अपनी दैनिक दिनचर्या से खाली हुआ तो उसे जामुनों का ख्याल आया। उसने जामुनों के तीन हिस्से किये एक हिस्सा अपने लिये, एक हिस्सा अपने घर के बाकी सदस्यों के लिये, और एक हिस्सा उस खास मित्र के लिये रखा जिसे वो बहुत मानता था। मनीष से आज उसकी मुलाकात बहुत दिनों के बाद होनी थी। मनीष ने सोचा कि प्यार से सने इन जामुनों को वह अपने दोस्त को जरूर खिलायेगा जिसे वो सबकी तुलना में अधिक चाहता है। मनीष अब इंतजार करने लगा, उसका दोस्त बाहर से अपने घर आ चुका था, वह मनीष से कुछ जरूरी बातें कर भी रहा था लेकिन वह मनीष को अपने घर आने के लिये कह नही रहा था हालांकि ऐसा अमूमन होता नही था, जब भी उसका दोस्त अपने घर आता घर आने के घंटे भर मे मनीष उसके पास होता था। दोपहर बीत चूका था सांझ हो आई थी मनीष बेचैन था वो अपने दोस्त के संदेशे का इंतजार कर रहा था कब उसका बुलावा आये और मनीष उसके घर पहुंचे उसे जामुन भंेट करके अपने प्रेम का प्रदर्शन कर सके। मनीष ने जामुनों को एक पालीथीन की थैली में बांध रखा था, बंधा होने से उसमें महक आने लगी थी। मनीष ने पालीथीन की थैली की गांठ को ऐसे खोला जैसे वह अपने दोस्त को अपनी दोस्ती के बंधन से आजाद कर रहा हो। कभी किसी के लिये बहुत कुछ करने की तमन्ना होती है लेकिन आदमी कर नही पाता है। समय के साथ लोगों की प्राथमिकतायें बदल तो जाती हैं लेकिन क्या इतनी भी बदल जानी चाहिये कि अजीज दोस्त से औपचारिकतायें भुला दी जायें इन्ही ख्यालों में डूबे हुये मनीष को पिछली सारी बातें याद आने लगी कि कैसे उसकी दोस्ती प्रगाढ़ हुई और उसने अपने दोस्त का जीवन संवारने के लिये क्या-क्या न किया। खैर सांझ का अंतिम पहर था, उसके दोस्त की कॉल आ गई, आओगे नही क्या ? मनीष ने कहा यार, तुम्हारी प्राथमिकता में मैं कब शामिल होऊंगा ? मैने तुम्हे बताया था कि शाम को मेरा निमंत्रण है, मुझे कहीं जाना है, तब तो तुमने कहा अरे शाम, को न जाना है, शायद भूल गये होगे, अब मुझे जाना है तो तुम अपने यहां बुला रहे हो।
झिड़कते हुये मनीष ने मोबाइल रख तो दिया लेकिन उसने जामुनों की फिर पोटली बांधी और पहुंच गया अपने मित्र के पास। उसको देखा तो उसका मित्र अपने कागजों में उलझा हुआ था, उसने तो उसे जी भर के देखा भी नही। उसने जामूनों की पोटली अपने मित्र को यह कहते हुये थमाई कि ये जामुन तुम्हारे लिये लाया हूं, उसके दोस्त ने बड़ी बेरूखी से कहा कि रख दो यार, खा लूंगा, मनीष अपने अंदर कूछ टूटता हुआ महसूस कर रहा था, कहाँ मनीष सोच रहा था कि उसका दोस्त जामुनों को झठ से हाथों में ले लेगा और खुश होते हुये कहेगा यार, तुम मेरा कितना ख्याल रखते हो। कहां से लाये हो, किसने दिया है ? ओह कितने अच्छे हैं लेकिन सारे प्रश्न दोस्त में आये हुये बदलाव में कहीं खो चुके थे। मनीष थोड़ी देर रूका जरूरी सलाह मशविरा किया और उसके घर से निकल लिया, पांव थोड़े भारी थे, मन मंे उसके विचारों के बादल उमड़-घूमड़ रहे थे कि प्रेम में पगे ये जामुन उसको किसी ने बड़े ही प्रेम से दिये थे, और वो इन जामुनों को ऐसे व्यक्ति को दे रहा था जिसने प्रेम को समझा ही नही शायद ! या उसे जामूनों की जरूरत नही होगी और अति प्रेम में पड़कर मनीष उसे जबरदस्ती दे रहा होगा तभी तो उसका दोस्त उस पर ध्यान नही दिया, अगर उसके दोस्त को जरूरत होती तो जरूर वह नोटिस करता। मनीष यह भी सोच रहा था कि बिना मांगें किसी को कोई चीज देनी ही नही चाहिये चाहे वह जामुन हो या फिर प्रेम क्योंकि बिना मांगे दिये जाने पर उस चीज की कद्र नही रह जाती है। मनीष मन ही मन कुछ निश्चय करता हुआ तेजी से अपने घर की ओर बढ़ चला था।
(प्रदीप तिवारी)


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें