“मैनेजर”
सबसे बढ़ियां तो लेडीज टीचर होती हैं उन्हे चाहिये ही क्या ? कुछ हजार रूपये साल में एक दो सूट के कपड़े बतौर ईनाम दे दो पड़ी रहेंगी, जब तक ससुराल चली नही जाती वो तब तक संस्था की सेवा करती रहती हैं। मैनेजर साहब ने अपना अनुभव शेयर करते हुए प्राईवेट स्कूलों का निचोड़ सबके सामने रख दिया। मैनेजर साहब का बड़ा बोल बाला था। जैसे तैसे पहले करकट में, फिर किराये के मकान में स्कूल डाला, गढ़ही और पोखरी को कब्जियाते हुए पचास प्रतिशत के घूस पर विधायक और सांसद निधि की बदौलत उन्होने एक विद्यालय खड़ा कर लिया। जहां तक उन्हे मान्यता मिली उन कक्षाओं तक विद्यालय तो चलाते रहे उसके आगे की कक्षाओं को अन्य मान्यता प्राप्त विद्यालयों से अटैच करके कक्षाओं को पास कराने की गारंटी के नाम पर चलाते रहे। इस धंधे से लाखों कमाया उन्होने, धीरे-धीरे मान्यता भी मिल गयी। इनके विद्यालय में पढ़ाने वाले अध्यापक एक हजार से पंद्रह सौ रूपये और अधिकतम 2500 रूपये प्रतिमाह पर खटते मिल जायेंगें। अध्यापकों की योग्यता से इन्हे कहां मतलब, जैसा दाम वैसा काम, इंटर पास इंटर को पढ़ा रहा है। हाईस्कूल फेल अध्यापक हाईस्कूल का मास्साहब बना है, शर्त यह है कि अध्यापक का चेहरा मोहड़ा सही होना चाहिये। ऐसे विद्यालयों में पढ़कर निकलने वाले छात्र इन्ही विद्यालयों में नौकरी करना पसंद भी करते हैं। ये विद्यालय लड़कों से ज्यादा लड़कियों को पढ़ाने पर तरजीह देते हैं। मैनेजर साहब का साल का तीन सौ दिन अध्यापक खोेजने मे ही बीतता रहता है। ऐसे में कोई बेरोजगार उनके यहां खुद को टीचर रखने का आवेदन कर दे तो उनकी बाछें खिल उठती हैं। आज शिल्पा का इंटरव्यूय था, बी.एस-सी. पास थी वो आगे मां बाप पढ़ाने में असमर्थ थे। वो भी शहर से पढ़कर आयी थी सो उसकी अपनी तमन्नायें थी। खूबसूरत चेहरा, कजरारी आंखे वाले शिल्पा के अंदर आकर्षण था । मैनेजर साहब के सामने वो उपस्थित हुई । अब मैनेजर साहब तो बीए के स्टूडेंट रहे हैं उन्हे साइंस आता जाता तो था नही लेकिन उन्होने बड़ी रौबदार आवाज में पूछा साइंस पढ़ा लेती हो ? शिल्पा ने जवाब दिया, जी सर। ओके, फिर 500 रूपया प्रति घंटा मिलेंगें चार कक्षाओं में साइंस पढ़ाना है। शिल्पा को नौकरी मिली गई। शिल्पा अब शिल्पा मैम हो गई। मैनेजर साहब की कृपा दृष्टि कुछ ज्यादा ही शिल्पा के ऊपर थी। पुरानी मैडमें अक्सर नई मैम शिल्पा की गलतियों को मैनेजर तक पहुंचानें में लगी रहती थी। मैनेजर साहब उन गलतियों को अरे ठीक है, कह कर नजर अंदाज कर देते थे और कहते थे कि अभी नयी है सीख जायेगी।
एक दिन शिल्पा स्कूल बंद होते ही अपने घर के लिए निकली, अभी कुछ दूर पहुंची ही थी कि मैनेजर साहब की चमचमाती कार पीछे से आ गयी। मैनेजर साहब ने कार रोक दी और विंडो के डोर को नीचे करते हुए शिल्पा से बोले बैठ जाओ छोड़ दूंगा। शिल्पा ने कहा ’नही सर’ मैं पैदल ही चली जाऊंगी। अरे आओ जी, उधर ही मुझे भी जाना है। शिल्पा सकुचाते हुये ही सही कार का दरवाजा खोलकर बैठ गयी। बाहर की चिलचिलाती धूप के आगे कार के अंदर की एसी उसे आनंदित कर गयी। मैनेजर साहब की कार के अंदर गाना बज रहा था “तुम अगर साथ देने के वादा करो मैं यूं ही मस्त नगमें सुनाता रहूं“, स्कूल कैसा चल रहा है ? मैनेजर साहब ने पूछा, ठीक है सर, बस बच्चे कमजोर हैं पढ़ने में। मैनेजर साहब ने कहा हां यह तो सही कह रही हो क्या करें अभिभावक ध्यान देते नही है। अब स्कूल वाले कितनी मेंहनत करें तुम्ही बताओ। मैनेजर ने शिल्पा को समझाते हुए कहा कि जरा तुम अपने हिसाब से विद्यालय को देखो थोड़ा ठीक ठाक कर दो। मैनेजर के बात करने की वजह से शिल्पा भी सहज हो चुकी थी। तभी शिल्पा के घर की ओर जाने का रास्ता आ गया। मैनेजर ने कार रोक दी। शिल्पा चौक पर उतर गई और वहां से कुछ दूरी पर स्थित अपने घर की ओर पैदल चली गयी। आज उसके चेहरे पर कुछ ज्यादा मुस्कुराहट थी। अगले दिन शिल्पा का विद्यालयी कार्य में मनोयोग बढ़ गया था। शिल्पा पूरे समर्पित भाव से विद्यालय को बेेहतर बनाने में लग चुकी थी। समय-समय पर मैनेजर के मीठे बोल और सराहना शिल्पा का जहां हौसला बढ़ा देते थे वहीं उसके साथ की मैडमें जल भुन जाती थी। पुरूष अध्यापकों के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर जाती थी । समय बीत रहा था, अब शिल्पा चार घंटी पढ़ाने के बाद आफिस के काम में हाथ बटाती थी। महीने की अंतिम तारीख थी आज स्कूल में हाफ डे होता है। दिन के 12 बजे बच्चों की छुट्टी हो गयी। सभी अध्यापक एक -एक करके चले गये। शिल्पा महीेने भर का हिसाब बना रही थी। 15 सौ रूपये का हिसाब मिल नही रहा था। शिल्पा पूरा लेखा जोखा चार बार जोड़ चुकी थी। माथे पर आ चुके पसीने को दुपट्टे से पोछते हुए शिल्पा ने अपना सिर उपर उठाया तो देखा की मैनेजर उसे निहार रहा था। दोनो की आंखें टकराई तो मैनेजर अचकचाया और पूछा क्या बात है, बहुत देर से परेशान हो ? शिल्पा ने कहा कि सर 1500 रूपये हिसाब में कम पड़ रहे हैं। मैनेजर मौन साध गया। इसके पूर्व शिल्पा की जगह जो काम देखती उस लड़की के हिसाब मंे गड़बड़ी हुई तो उसकी वेतन से मैनेजर ने पैसा काट लिया था। शिल्पा को इस बात का गम नही थी कि उसके वेतन से पैसे कट जायेंगे वो यह सोच -सोच कर परेशान थी उसकी रेपूटेशन खराब हो जायेगी। स्टाफ के लोग उसे चोर न समझ लें। यह सब सोच कर शिल्पा एक बार फिर लेखा मिलाने लगी। स्कूल में बस दो ही लोग बचे थे मैनेजर और शिल्पा। मैनेजर उसे निहारे जा रहा था। तभी मैनेजर उठा और शिल्पा के हाथ से उसकी कलम निकालते हुये बोला छोड़ो यार, हिसाब किताब कहां उलझ गयी हो ? शिल्पा मैनेजर के हरकत का प्रतिरोध नही कर सकी। वह बोली सर लेकिन हिसाब तो हिसाब है न, मैनेजर उसकी बात काटते हुए बोला तुम इतने मेंहनत से काम करती हो मेरा दिल जीत ली हो। रूपया पैसा आयेगा जायेगा लेकिन मैं अपनी सबसे खूबसूरत और इंटेलीजेंट स्टाफ के चेहरे पर शिकन नही देख सकता। लीव दैट, मेरे नाम से लिख दो वो पंद्रह सौ रूपया। जी सर, बस इतना कह सकी शिल्पा। शिल्पा घर आ चुकी थी। पूरे वाकये ने उसे परेशान कर रखा था। यार, खूबसूरत, इंटेलीजेंट जैसे शब्द उसके दिमाग में बिजली की तरह कौंध रहे थे। मैनेजर भी आकर्षक था लेकिन कभी शिल्पा ने उसे इस नजर से देखा नही था। मैनेजर का बेतकल्लुफ होना बढ़ता गया। शिल्पा उसके आकर्षण पाश में बंधती चली गयी। शिल्पा तीन बहने थी, शिल्पा, प्रिया और प्रज्ञा उसके पापा एक छोटी दुकान चलाते थे। खर्च बढ़ता गया तो शिल्पा ने भी कुछ करने की सोची थी। जिस तरह शिल्पा की मां फ्रेंडली नेचर की थी उसी तरह से शिल्पा भी थी। यह फेमली पिक्चर, टीवी देखकर एडवांस हुई थी। मैनेजर की मेहरबानियां शिल्पा के उपर बढ़ने लगी थी। शिल्पा भी घर से लेकर बाहर तक ”मैनेजर सर“ की ही चर्चा करती थी। सर, होली पर जरूर आईयेगा शिल्पा ने मैनेजर से आग्रह किया मैनेजर ने कहा जरूर जरूर क्यों नहीं ? होली के दिन शाम को मैनेजर शिल्पा के घर पहुंचा तो उसकी खूब आवभगत हुई। मैनेजर ने कहा कि शिल्पा तुम्हारे घर का हर आईटम बढ़िया है। मम्मी ने बनाया है सर, वो खाना भी बहुत बढ़िया बनाती हैं नानवेज तो पूछिये मत। ’अच्छा ’ कभी खिलाओ तो जाने, शिल्पा की मम्मी बोली जब कहें तब, दिन मुकाम मुकर्रर हो गया। मैनेजर बोला कि एक ही शर्त पर खाऊंगा जब आप लोगों का एक पैसा खर्च न हो यानी का सारा इंतजाम मेरा होगा। सब लोग हंसने लगे। दावत के दिन मैनेजर ने पैसा खर्च करने में कोई कोताही नही की। पूरे परिवार मैनेजर का मूरीद हो चुका था। शिल्पा की छोटी बहन प्रज्ञा को भी नानवेज पसंद था बला की खूबसूरत थी वो मैनेजर उसे भी कनखियों से देखे जा रहा था। अब तो शिल्पा के मैनेजर से घरेलू सम्बंध हो चुके थे। मैनेजर का आना जाना बढ़ गया था। हफ्ते में एक दिन दावत के लिए मुकर्रर था। पैसा खर्च होता था मैनेजर का। मैनेजर के लिए उतनी रकम दाल में नमक के बराबर थी। गाहे बगाहे मैनेजर शिल्पा व उसकी बहनों की आर्थिक मदद भी कर देता था। शिल्पा और उसके परिवार पर मैनेजर के एहसान बढ़ते जा रहे थे, शिल्पा कभी-कभी सोचती कि आखिर क्यों मैनेजर उसके उपर इतनी मेहरबानी करता है ? कनखियों से निहारता रहता है, मौका देखकर छूने की कोशिश करता है। उत्तर सोच शिल्पा मन ही मन रोमांचित होने लगी। एक दिन आफिस मंे बैठी शिल्पा काम कर रही थी मैनेजर उसे कनखियों से निहार रहा था तभी शिल्पा ने हिम्मत करके पूछ लिया क्या देख रहे हैं सर ? मैनेजर मजे मजाये खिलाड़ी की तरह बोला जब इतनी सुंदर लड़की सामने बैठी हो तो कोई और क्या देखेगा ? शिल्पा मुस्कुरा उठी मैनेजर ने कहा तुम बहुत खूबसूरत हो । मैनेजर उठा और कुर्सी पर बैठी शिल्पा के अधरों पर अपने अधर रख दिये। शिल्पा ने कहा नही, सर मुझे छोड़िये कहीं कुछ गलत न हो जाय। मैनेजर ने उसे अपने बाहों में भरते हुए बोला जिंदगी में कहीं कुछ गलत नही है। मैं हूं न, सब सही हो जायेगा। शिल्पा के ओठ रोमांच से कांप रहे थे, बदन थरथरा रहा था लेकिन मैनेजर का आकर्षण इतना जबरदस्त था कि वह उसे परे नही ढकेल सकी। मैनेजर ने कहा शिल्पा, जिंदगी का मजा लो, मेरा साथ दो तुम भी मजा लो, यह स्कूल तुम्हारा है, मेरा सबकुछ तुम्हारा है। मैनेजर न्यौछावर हुये जा रहा था। उसके हाथ तेजी से शिल्पा के बदन पर फिसल रहे थे। शिल्पा को मालकिन होने का एहसास होने लगा था उसका चेहरा गर्व से भरता जा रहा था। बिना इस बात के एहसास के कि उसी जगह मैनेजर न जाने कितनी शिल्पाओं को मालकिन बनाया था, अपना सब कुछ देने का वादा कर उनका सबकुछ छीन लिया था। विद्या के मंदिर में ही वर्जनाओं के बांध टूट गये। शिल्पा निढाल हो चुकी थी, उत्तेजना में पागल शिल्पा अपना सबकुछ सौंपने के लिए आतुर हो चुकी थी। शिल्पा और मैनेजर काफी देर तक स्कूल की आफिस के सोफे पर पड़े रहे। फिर तो सिलसिला चल पड़ा। शिल्पा स्कूल मंे बच्चों को पढ़ाती, स्कूल बंद होने के बाद मैनेजर शिल्पा को काम शास्त्र पढ़ाता। स्कूल बंद होने के बाद शिल्पा देर तक रूकने लगी। किसी न किसी बहाने स्कूल के बाहर भी शहर मुख्यालय तक दोनो जाते किसी होटल के कमरे को गुलजार करते। मैनेजर दिल खोल कर शिल्पा के उपर पैसा लूटाता। शिल्पा पूरी तरह खुल चुकी थी। स्कूल भी वह मेहनत से संभालती मैनेजर का दिल भी। मैनेजर ने उसकी तरक्की करते हुए अब विद्यालय का प्रिंसीपल बना दिया था। वक्त बीतते रहे शिल्पा का पूरा रौब स्कूल मंे चलता था। मैनेजर तो भवंरा था उसे हर वक्त कली की ही तलाश रहती थी। धीरे-धीरे वह भी समय आ गया जब शिल्पा के विवाह की चिंता उसके घर वालों की हुई। एक ठीक-ठाक परिवार में शिल्पा की शादी तय हो गई। शिल्पा की शादी में मैनेजर ने दिल खोलकर पैसा खर्च किया। शिल्पा को समझाया अगर समाज का डर नही होता तो मैं तुम्हे कभी छोड़ता नही मैं शादी कर लेता। उसने शिल्पा को लहंगा चुनरी खरीदवाया कई मनचाही खरीदारी से शिल्पा को गदगद कर दिया। शिल्पा विदा हो गई। एक दो माह बाद मौका देखकर एक दिन मैनेजर शिल्पा के घर पहुंचा शिल्पा की मां ने चाय नाश्ता दिया। मैनेजर अफसोस में सिर झुकाये बैठे रहा। परिवार वालों ने पूछा आखिर बात क्या है सर जी ? मैनेजर ने कहा कोई बात नही बस टेंशन है स्कूल की। घर वालों ने जब बहुत दबाव दिया तो मैनेजर ने जाल फेंकते हुए कहा कि शिल्पा जब से गई है विद्यालय लड़खड़ा गया है, कोई संभालने वाला नही है मेहनती स्टाफ मिल नही रहा है कुछ दिन अगर प्रज्ञा स्कूल में सेवा कर देती तो अच्छा रहता। मैनेजर ने अपनी बात रखते हुए कहा कि कम से कम प्रज्ञा का पाकेट खर्च तो निकल ही जायेगा सूट ड्रेस के लिए पापा से पैसे तो नही न मांगने पड़ेगें। प्रज्ञा भी घर में रहते-रहते बोर हो रही थी। उसने हामी भर दी। अब प्रज्ञा मैनेजर के स्कूल में जाने लगी, धीरे-धीरे मैनेजर उसके तारीफों के पुल बांधने लगा था। विद्यालय के स्टाफ में फुसफुसाहट तेज होने लगी, अध्यापकों के चेहरे पर कुटिल मुस्कान तैर चुकी थी।
( प्रदीप तिवारी )
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