”प्रेमचंद का अधूरा सम्मान”

                     पंडित नगीना स्मारक महाविद्यालय

                                                 जोकहरा आजमगढ़

                         (सम्बद्ध:उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन , मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज)

                                                 लघु शोध प्रबंध

 एम.ए. द्वितीय वर्ष तृतीय सेमेस्टर हिंदी विषय से स्नातकोत्तर उपाधि की आंशिक पूर्ति हेतु प्रस्तुत शोध रिपोर्ट   सत्र: 2024 -25

                                     ''प्रेमचंद का अधूरा सम्मान” 


  निर्देशक                                                                                           शोधकर्ता

                                                                                              प्रदीप कुमार तिवारी

विभागाध्यक्ष ंिहंदी                                                          एम. ए. द्वितीय वर्ष तृतीय 

पंडित नगीना स्मारक                                                             सेमेस्टर  विषय हिंदी

महाविद्यालय, आजमगढ़                                                       नामांकन संख्या -

                                                                                                   2321379226274018

                                                                                              अनुक्रमांक 23411798



                    प्रेमचंद का अधूरा सम्मान 

भूमिका: 

मंशी प्रेमचंद को किसी ने उपन्यास सम्राट तो किसी ने कहानीकार कहा, नाटककार, संपादक, अनुवादक, कई बार तो उन्होने चित्रकार भी कहा गया। हिंदी साहित्य को नई दिशा देने वाले कालजयी रचनाकार मुंशी प्रेमचंद की लमही एक अदद स्मारक को तरस गई। मेरे लघु शोध का विषय यही है। हम सबने बचपन में जब भी मंुशी प्रेमचंद की जीवनी में यह पढ़ा कि उनका जन्म वाराणसी 4 मील दूर आजमगढ़ जाने वाले मार्ग पर लमही नामक गांव में हुआ था। आजमगढ़ का होने के कारण लमही के प्रति एक बरबस आकर्षण शुरू से मन में था। जब कभी आजमगढ़ से वाराणसी जाना हुआ तो पांडेयपुर से पहले दायीं ओर दो बैल की प्रतिमा दिख जाती है, इसके साथ, किसान, मजदूर के चित्र जो पिछले एक दशक के दौरान बने दिख जाते हैं तो स्वमेव  प्रेमचंद जी का रचना संसार आंखों के आगे घूम जाता है। जिंदगी भर एक गरीब आदमी समाज के शोषित व पीड़ित वर्ग की आवाज उठाने वाले मंुशी जी के साहित्य पर आलोचना व विमर्श लिखकर न जाने कितने साहित्यकार धनाड्य हो गये और मंहगी-मंहगीं गाड़ियों से चलने लगे। हिंदी के इन वरद पुत्रांे ने क्या मंुशी जी के लमही की सुध ली ? वो लमही मंे मुंशी जी की कोठी जहां के खेत खलिहान, किसान, मजदूर, कुयें, बैल, हलकू, झबरा, मैकू, सरपंच, चौधरी, हमीद, पंडित जी और न जाने कितने पात्रों ने मुंशी जी के साहित्य सृजन की प्रेरणास्रोत रहे आज विरान सी पड़ी है। वो लमही अपने लाल के स्मारक के लिये आज तक तरस रही है। वाह रे उपन्यास सम्राट आपकी चार सौ से अधिक कहानिया, पंद्रह से ज्यादा उपन्यास, संपादन, अनुवाद सब के सब तथा, आपकी लेखकीय आभा मंडल से वशीभूत होकर आपकी दिखाई धारा पर चलने वाले हजारो साहित्यकारों का रचना संसार एक पुस्तकालय के चंद कमरों की मुहताज हैं। पुस्तकालय चलता भी है तो किसी के नीजी प्रेम और प्रयास से वो भी महज एक कमरे में। कभी जाना हो तो लमही जाकर देखियेगा मेरी बातें अक्षरशः सत्य न साबित हो जायें तो आपके दिये हर दण्ड का मैं भागीदार होऊंगा। कालजयी रचनाकार कह भर देने से क्या प्रेमचंद जी का सम्मान हो गया ?, उपन्यास सम्राट कह भर देने से क्या उनका सम्मान हो गया। किसी सरकारी गजट पर उन्हे उपन्यास सम्राट से नवाज कर प्रमाण पत्र दिये गये  जवाब होगा किसी पर भी नही। जब तक मुंशी प्रेमचंद के जन्मस्थान लमही में एक स्मारक नही बनता, उनके नाम से एक विशाल पुस्तकालय की स्थापना नही होती तथा उनके नाम से सरकारी स्तर पर एक पुरस्कार प्रारंभ नही होता मुझे लगता है कि प्रेमचंद का सम्मान नही हुआ है उनका सम्मान अभी भी अधूरा है। 

कालजयी रचनाकार मुंशी प्रेमचंद

जन्म:

प्रेमचन्द जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 को बनारस शहर से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे।

जीवन:

धनपतराय की उम्र जब केवल आठ साल की थी तो माता के स्वर्गवास हो जाने के बाद से अपने जीवन के अन्त तक लगातार विषम परिस्थितियों का सामना धनपत राय को करना पड़ा। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली जिसके कारण बालक प्रेम व स्नेह को चाहते हुए भी ना पा सका। आपका जीवन गरीबी में ही पला। कहा जाता है कि आपके घर में भयंकर गरीबी थी। पहनने के लिए कपड़े न होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था। इन सबके अलावा घर में सौतेली माँ का व्यवहार भी हालत को खस्ता करने वाला था।

शादी

आपके पिता ने केवल 15 साल की आयू में आपका विवाह करा दिया। पत्नी उम्र में आपसे बड़ी और बदसूरत थी। पत्नी की सूरत और उसके जबान ने आपके जले पर नमक का काम किया। आप स्वयं लिखते हैं, “उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया। उसके साथ- साथ जबान की भी मीठी न थी। आपने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है “पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया, मेरी शादी बिना सोंचे समझे कर डाली।” हालांकि आपके पिताजी को भी बाद में इसका एहसास हुआ और काफी अफसोस किया। विवाह के एक साल बाद ही पिताजी का देहान्त हो गया। अचानक आपके सिर पर पूरे घर का बोझ आ गया। एक साथ पाँच लोगों का खर्चा सहन करना पड़ा। पाँच लोगों में विमाता, उसके दो बच्चे पत्नी और स्वयं। प्रेमचन्द की आर्थिक विपत्तियों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी। एक दिन ऐसी हालत हो गई कि वे अपनी सारी पुस्तकों को लेकर एक बुकसेलर के पास पहुंच गए। वहाँ एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने आपको अपने स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त किया।

शिक्षा:

अपनी गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में आप अपने गाँव से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे। मगर गरीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने - जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। इस दो रुपये से क्या होता महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में मैट्रिक पास किया।

साहित्यिक रुचि:


गरीबी, अभाव, शोषण तथा उत्पीड़न जैसी जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी प्रेमचन्द के साहित्य की ओर उनके झुकाव को रोक न सकी। प्रेमचन्द जब मिडिल में थे तभी से आपने उपन्यास पढ़ना आरंभ कर दिया था। आपको बचपन से ही उर्दू आती थी। आप पर नॉवल और उर्दू उपन्यास का ऐसा उन्माद छाया कि आप बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही सब नॉवल पढ़ गए। आपने दो तीन साल के अन्दर ही सैकड़ों नॉवेलों को पढ़ डाला।

आपने बचपन में ही उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरुर मोलमा शार, रतन नाथ सरशार आदि के दीवाने हो गये कि जहाँ भी इनकी किताब मिलती उसे पढ़ने का हर संभव प्रयास करते थे। आपकी रुचि इस बात से साफ झलकती है कि एक किताब को पढ़ने के लिए आपने एक तम्बाकू वाले से दोस्ती करली और उसकी दुकान पर मौजूद “तिलस्मे- होशरुबा” पढ़ डाली।
अंग्रेजी के अपने जमाने के मशहूर उपन्यासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तरजुमो को आपने काफी कम उम्र में ही पढ़ लिया था। इतनी बड़ी दृ बड़ी किताबों और उपन्यासकारों को पढ़ने के बावजूद प्रेमचन्द ने अपने मार्ग को अपने व्यक्तिगत विषम जीवन अनुभव तक ही महदूद रखा।

तेरह वर्ष की उम्र में से ही प्रेमचन्द ने लिखना आरंभ कर दिया था। शुरु में आपने कुछ नाटक लिखे फिर बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना आरंभ किया। इस तरह आपका साहित्यिक सफर शुरु हुआ जो मरते दम तक साथ - साथ रहा।

प्रेमचन्द की दूसरी शादी


सन 1905 में आपकी पहली पत्नी पारिवारिक कटुताओं के कारण घर छोड़कर मायके चली गई फिर वह कभी नहीं आई। विच्छेद के बावजूद कुछ सालों तक वह अपनी पहली पत्नी को खर्चा भेजते रहे। सन् 1905 के अन्तिम दिनों में आपने शीवरानी देवी से शादी कर ली। शीवरानी देवी एक विधवा थी और विधवा के प्रति आप सदा स्नेह के पात्र रहे थे।

यह कहा जा सकता है कि दूसरी शादी के पश्चात् आपके जीवन में परिस्थितियां कुछ बदली और आय की आर्थिक तंगी कम हुई। आपके लेखन में अधिक सजगता आई। आपकी पदोन्नति हुई तथा आप स्कूलों के डिप्टी इन्सपेक्टर बना दिये गए। इसी खुशहाली के जमाने में आपकी पाँच कहानियों का संग्रह सोजे वतन प्रकाश में आया। यह संग्रह काफी मशहूर हुआ।

व्यक्तित्व:
सादा एवं सरल जीवन के मालिक प्रेमचन्द सदा मस्त रहते थे। उनके जीवन में विषमताओं और कटुताओं से वह लगातार खेलते रहे। इस खेल को उन्होंने बाजी मान लिया जिसको हमेशा जीतना चाहते थे। अपने जीवन की परेशानियों को लेकर उन्होंने एक बार मुंशी दयानारायण निगम को एक पत्र में लिखा “हमारा काम तो केवल खेलना है, खूब दिल लगाकर खेलना, खूब जी तोड़ खेलना, अपने को हार से इस तरह बचाना मानों हम दोनों लोकों की संपत्ति खो बैठेंगे। किन्तु हारने के पश्चात्  पटखनी खाने के बाद, धूल झाड़ खड़े हो जाना चाहिए और फिर ताल ठोंक कर विरोधी से कहना चाहिए कि एक बार फिर जैसा कि सूरदास कह गए हैं, “तुम जीते हम हारे। पर फिर लड़ेंगे।” कहा जाता है कि प्रेमचन्द हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। विषमताओं भरे जीवन में हंसोड़ होना एक बहादुर का काम है। इससे इस बात को भी समझा जा सकता है कि वह अपूर्व जीवनीदृशक्ति का द्योतक थे। सरलता, सौजन्यता और उदारता के वह मूर्ति थे।

जहां उनके हृदय में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में गरीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति का अथाह सागर था। जैसा कि उनकी पत्नी कहती हैं “कि जाड़े के दिनों में चालीस दृ चालीस रुपये दो बार दिए गए दोनों बार उन्होंने वह रुपये प्रेस के मजदूरों को दे दिये। मेरे नाराज होने पर उन्होंने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि हमारे प्रेस में काम करने वाले मजदूर भूखे हों और हम गरम सूट पहनें।“

प्रेमचन्द उच्चकोटि के मानव थे। आपको गाँव जीवन से अच्छा प्रेम था। वह सदा साधारण गंवई लिबास में रहते थे। जीवन का अधिकांश भाग उन्होंने गाँव में ही गुजारा। बाहर से बिल्कुल साधारण दिखने वाले प्रेमचन्द अन्दर से जीवनीदृशक्ति के मालिक थे। अन्दर से जरा सा भी किसी ने देखा तो उसे प्रभावित होना ही था। वह आडम्बर एवं दिखावा से मीलों दूर रहते थे। जीवन में न तो उनको विलास मिला और न ही उनको इसकी तमन्ना थी। तमाम महापुरुषों की तरह अपना काम स्वयं करना पसंद करते थे।
ईश्वर के प्रति आस्था:

जीवन के प्रति उनकी अगाढ़ आस्था थी लेकिन जीवन की विषमताओं के कारण वह कभी भी ईश्वर के बारे में आस्थावादी नहीं बन सके। धीरे - धीरे वे अनीश्वरवादी से बन गए थे। एक बार उन्होंने जैनेन्दजी को लिखा “तुम आस्तिकता की ओर बढ़े जा रहे हो पक्के भग्त बनते जा रहे हो। मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।“
मृत्यू के कुछ घंटे पहले भी उन्होंने जैनेन्द्रजी से कहा था दृ “जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय में ईश्वर को याद करते हैं मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।“

प्रेमचन्द की कृतियाँ


प्रेमचन्द ने अपने नाते के मामू के एक विशेष प्रसंग को लेकर अपनी सबसे पहली रचना लिखी। 13 साल की आयु में इस रचना के पूरा होते ही प्रेमचन्द साहित्यकार की पंक्ति में खड़े हो गए। सन् 1894 ई० में “होनहार बिरवान के चिकने  पात” नामक नाटक की रचना की। सन् 1898 में एक उपन्यास लिखा। लगभग इसी समय “रुठी रानी” नामक दूसरा उपन्यास जिसका विषय इतिहास था की रचना की। सन 1902 में प्रेमा और सन् 1904-05 में “हम खुर्मा व हम सवाब” नामक उपन्यास लिखे गए। इन उपन्यासों में विधवा जीवन और विधवा समस्या का चित्रण प्रेमचन्द ने काफी अच्छे ढंग से किया।

जब कुछ आर्थिक निश्ंिचतता आई तो 1905 में पाँच कहानियों का संग्रह सोजे वतन (वतन का दुख दर्द) की रचना की। जैसा कि इसके नाम से ही मालूम होता है, इसमें देश प्रेम और देश को जनता के दर्द को रचनाकार ने प्रस्तुत किया। अंग्रेज शासकों को इस संग्रह से बगावत की झलक मालूम हुई। इस समय प्रेमचन्द नवाब राय के नाम से लिखा करते थे। लिहाजा नवाब राय की खोज शुरु हुई। नवाब राय पकड़ लिये गए और शासक के सामने बुलाया गया। उस दिन आपके सामने ही आपकी इस कृति को अंग्रेजी शासकों ने जला दिया और बिना आज्ञा न लिखने का बंधन लगा दिया गया।

इस बंधन से बचने के लिए प्रेमचन्द ने दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उनको बताया कि वह अब कभी नवाब राय या धनपतराय के नाम से नहीं लिखेंगे तो मुंशी दयानारायण निगम ने पहली बार प्रेमचन्द नाम सुझाया। यहीं से धनपत राय हमेशा के लिए प्रेमचन्द हो गये।

“सेवा सदन“, “मिल मजदूर” तथा 1935 में गोदान की रचना की। गोदान आपकी समस्त रचनाओं में सबसे ज्यादा मशहूर हुई अपनी जिन्दगी के आखिरी सफर में मंगलसूत्र नामक अंतिम उपन्यास लिखना आरंभ किया। दुर्भाग्यवश मंगलसूत्र को अधूरा ही छोड़ गये। इससे पहले उन्होंने महाजनी और पूँजीवादी युग प्रवृत्ति की निन्दा करते हुए “महाजनी सभ्यता” नाम से एक लेख भी लिखा था।

मृत्यु


सन् 1936 ई० में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। अपने इस बीमार काल में ही आपने “प्रगतिशील लेखक संघ” की स्थापना में सहयोग दिया। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण 8 अक्टूबर 1936 में आपका देहान्त हो गया। और इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण- कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया।

प्रेमचंद की लेखन शैली और प्रभाव

प्रेमचंद को हिंदी का पहला लेखक माना जाता है, जिनकी रचनाओं में यथार्थवाद प्रमुखता से दिखाई दिया । उनके उपन्यास गरीबों और शहरी मध्यम वर्ग की समस्याओं का वर्णन करते हैं। उनकी रचनाएँ एक बुद्धिवादी दृष्टिकोण को दर्शाती हैं, जो धार्मिक मूल्यों को ऐसी चीज़ के रूप में देखता है जो शक्तिशाली पाखंडियों को कमज़ोरों का शोषण करने की अनुमति देता है। उन्होंने साहित्य का उपयोग राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों के बारे में जन जागरूकता जगाने के उद्देश्य से किया और अक्सर भ्रष्टाचार , बाल विधवापन, वेश्यावृत्ति , सामंती व्यवस्था , गरीबी , उपनिवेशवाद और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित विषयों पर लिखा । प्रेमचंद ने 1900 के दशक के अंत में कानपुर में रहते हुए राजनीतिक मामलों में रुचि लेना शुरू कर दिया था और यह उनकी शुरुआती रचनाओं में परिलक्षित होता है, जिनमें देशभक्ति की झलक मिलती है। उनके राजनीतिक विचार शुरू में उदारवादी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले से प्रभावित थे , लेकिन बाद में वे अधिक उग्रवादी बाल गंगाधर तिलक की ओर बढ़ गए ।  उन्होंने मिंटो-मोर्ले सुधार और मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों को अपर्याप्त माना और अधिक राजनीतिक स्वतंत्रता का समर्थन किया।  उनकी कई शुरुआती रचनाओं, जैसे ए लिटिल ट्रिक और ए मोरल विक्ट्री में उन भारतीयों पर व्यंग्य किया गया, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग किया था । उन्होंने अपनी कुछ कहानियों में मजबूत सरकारी सेंसरशिप के कारण विशेष रूप से अंग्रेजों का उल्लेख नहीं किया ,
1920 के दशक में, वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन और सामाजिक सुधार के लिए संघर्ष से प्रभावित थे। इस अवधि के दौरान, उनकी रचनाएँ गरीबी, ज़मींदारी शोषण ( प्रेमाश्रम , 1922), दहेज प्रथा ( निर्मला , 1925), शैक्षिक सुधार और राजनीतिक उत्पीड़न ( कर्मभूमि , 1931) जैसे सामाजिक मुद्दों से निपटीं।  प्रेमचंद का ध्यान किसानों और मज़दूर वर्ग के आर्थिक उदारीकरण पर था और उन्होंने तेज़ी से हो रहे औद्योगीकरण का विरोध किया, जिससे उन्हें लगा कि किसानों के हितों को नुकसान पहुँचेगा और मज़दूरों का उत्पीड़न होगा।  इसे रंगभूमि (1924) जैसी रचनाओं में देखा जा सकता है ।

भारतीय साहित्य पर प्रेमचंद के प्रभाव को कम करके नहीं आंका जा सकता। जैसा कि दिवंगत विद्वान डेविड रुबिन ने द वर्ल्ड ऑफ प्रेमचंद (1969) में लिखा , ष्प्रेमचंद को हिंदी और उर्दू दोनों में गंभीर लघु कथा-और गंभीर उपन्यास की शैली बनाने का गौरव प्राप्त है। वस्तुतः अकेले ही, उन्होंने इन भाषाओं में कथा साहित्य को लक्ष्यहीन रोमांटिक इतिहास के दलदल से निकालकर यथार्थवादी कथा के उच्च स्तर पर पहुँचाया, जो उस समय के यूरोपीय कथा साहित्य के बराबर था; और इसके अलावा, दोनों भाषाओं में वे एक अद्वितीय गुरु बने रहे।

अपने अंतिम दिनों में, उन्होंने जटिल नाटक के मंच के रूप में ग्राम जीवन पर ध्यान केंद्रित किया, जैसा कि उपन्यास गोदान (1936) और लघु-कथा संग्रह कफ़न (1936) में देखा गया है। प्रेमचंद का मानना था कि समकालीन बंगाली साहित्य की स्त्री गुणवत्ता कोमलता और भावना के विपरीत, सामाजिक यथार्थवाद हिंदी साहित्य का रास्ता था ।
प्रेमचंद जी को मिले सम्मानों की बात करें तो प्रेमचंद की स्मृति में 31 जुलाई 1980 को भारतीय डाक द्वारा 30 पैसे का विशेष डाक टिकट जारी किया गया। 
लमही में प्रेमचंद के पैतृक घर का राज्य सरकार द्वारा जीर्णाेद्धार किया जा रहा है ऐसा कहा जाता है पर असलियत में प्रेमचंद के जन्मस्थान पर उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गई है और नीजी प्रयासों से सुरेंश चंद दूबे के द्वारा एक कमरे में जो  नागरी प्रचारणी सभा ने बनवाया है एक पुस्तकालय चलाया जा रहा है।  सिलीगुड़ी में मुंशी प्रेमचंद महाविद्यालय का नाम उनके नाम पर रखा गया है। मुंशी प्रेमचंद के नाम पर एक अभिलेख केंद्र केंद्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिलिया इस्लामिया में स्थापित किया गया है । यह प्रेमचंद की लेखनी की विरासत को संग्रहीत करने के लिए आया था क्योंकि उनकी प्रसिद्ध कहानी कफ़न उन्होंने जामिया में ही लिखी थी और यह पहली बार  जामिया  में प्रकाशित हुई थी । 31 जुलाई 2016 को, गूगल ने मुंशी प्रेमचंद की 136वीं जयंती के उपलक्ष्य में एक गूगल डूडल दिखाया। यही कुल मिला जुला सम्मान है जो हमे पढ़ने को मिल जाता है। प्रेमचंद जी को कोई  पुरस्कार शायद ही मिला, आजमगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश प्रसाद बर्नवाल  कुंद जी बताते हैं कि तब ऐसी परम्परा भी नही  थी। 

आखिर क्यों न बन सका लमही मे स्मारक

आज से लगभग 65 साल पहले 8 अक्टूबर सन 1959 को कालजयी कथाकार की 23 वीं पुण्यतिथि पर उनके गृहग्राम लमही में गणमान्य जन जुटे थे। देश के प्रथम  राष्टपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने अपने हाथों से प्रेमचंद स्मारक भवनक की आधारशीला रखी थी। प्रेमचंद जी के परिजनों पत्नी शिवरानी देवी, अनुज महताब राय व पुत्र अमृत राय समेत अनेक हस्तियां वहां जुटी थीं, इनमें उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल वाराह वेंकटगिरि, मुख्यमंत्री डा. सम्पूर्णानंद, पंडित कमलापति त्रिपाठी और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे सुधी और विद्वतजन भी थे। समय गुजरता गया लमही में स्मारक आकार नही ले सका । जो हुआ वह नाकाफी था, और प्रेमचंद जैसी शख्सियत की गौरव गरिमा के अनुकूल भी न था। इस घटना के छियालिय साल बाद तत्कालीन राज्यसभा सदस्य सुश्री सरला महेश्वरी की पहल पर लमही में स्मारक के संकल्प के साथ एक बड़ा आयोजन हुआ इसमे औरों के साथ-साथ भारत सरकार के तत्कालीन सांस्कृतिक मंत्री जयपाल रेड्डी और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी मौजूद थे। उन्होने लमही में विराट जनसमुदाय के समक्ष राष्ट्रीय स्माकर के निर्माण का ऐलान किया । इस आयोजन को भी कई साल बीत गये लेकिन स्माकर आकार नही ले सका । लमही वह ग्राम है जो प्रेमचंद की स्मृतियों से कभी विलग नही हो सकता लमही के कृषक, लमही के वासी और लमही के कामगार चाहते हैं कि लमही में लमही में जन्मे प्रेमचंद का स्माकर उनकी गौरव गरिमा के अनुरूप बने।  बेहतर तो ये होता कि पिछली अर्धशती में लमही को सांस्कृतिक तीर्थ स्थली अथवा साहित्य ग्राम के तौर पर शनै- शनै विकसित किया जाता किंतु ऐसा हो नही सका। साहित्य और संस्कृति किसी सियासी पार्टी के एजेंण्डे में  न ही कल थे और न ही आज है। संतो, महात्माओं और महापुरूषों की स्मृति को अक्षुण बनायें रखने के वास्ते यूपी में यूं तो पार्क और प्रतिमाओं को बनवाने की धूम रही है। अलबत्त शताब्दी के महानतम भारतीय व विश्व साहित्यकारों में शुमार हिंदी के अन्यनतम साहित्यकार प्रेमचंद का नाम इस पूनीत कर्म में जुटे किसी भी संस्था की सूची में नही हैं। 
यह अपने देश की माटी का कर्ज उतारने की सदिच्छा ही है कि लखनऊ में रह रहे विजय राय ने अपनी रचना पत्रिका का  नामकरण “लमही“ किया है। मगर प्रेमचंद का योगदान इतना बड़ा और अर्थवान है कि सरकार और समाज की ओर लमही में इसी के अनुरूप प्रेमचंद स्मारक शोध संस्थान और संग्रहालय की स्थापना जरूरी प्रतीत होती है। कि यह प्रेमचंद के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन भी होगी और विस्मरण के विरूद्ध सार्थक उपक्रम भी साहित्य, संगीत, कला विहीन समाज की स्थिति के बारे में भारतीय मनीषी ने शताब्दियों पूर्व जो टिप्पड़ी की थी, वह बरबस फिर-फिर याद आती है। इसे क्या कहा जाय कि भारत सरकार के मंत्रियांें के पास इस बाबत बात करने की फूर्सत नही है। प्रेमचंद का स्मारक बनाने में जो पेंच है नागरी प्रचारणी सभा ने प्रेंमचद के परिवार से दान में मिले लमही स्थित भवन को दानकर अपने हाथ झटक लिये हैं। प्रेमचंद के अधूरे सम्मान का प्रसंग निश्चित ही दुखदायी है। कहना कठिन है कि इस प्रसंग का सुखद समापन होगा अथवा यह स्मारक कथा शोकांतिका का रूप लेगी। यह तय है कि अविस्मरणीय प्रेमचंद का स्मारक तभी मूर्तरूप ले सकेगा जब हिंदी -जन इसके लिये समवेत प्रयास करेंगेें ।
मैं अपने लघु शोध प्रबंध के सिलसिले में जब लमही पहुंचा तो वहां मेरी मुलाकात लमही से सटे एक गांव गोइठहां के निवासी समाजसेवी सुरेश चंद दूबे से हुई जो लमहीं में प्रेमचंद के जन्मस्थान एक निःशुल्क एक कमरे का पुस्तकालय चलाते हैं। उनसे बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो वो धारा प्रवाह बोलना शुरू कर दिये। उनका धारा प्रवाह वक्तव्य यह बता रहा था कि लमही में आने वाले साहित्यजनों को प्रेंमचंद जी के बारे में बताते उन्हे प्रेमचंद जी का रचना संसार ही नही वरन एक-एक रचना की पृष्ठभूमि भी याद हो चुकी है। दिन भर में दर्जनों आने - जाने वाले सुधी जनों, विद्यार्थिंयों, शोधकर्ताओं को वो प्रेमचंद के बारे में बताते रहते हैं, प्रेमचंद से जुड़ी स्मृतियों का अवलोकन, उनके  प्रमाण पत्रों के अवलोकन कराते रहते हैं। प्रेमचंद जिसे हुक्के को गुड़गुड़ाते थे वो आज भी उनके पुस्तकालय में रखा हुआ है। हुक्का ही क्या ? प्रेमचंद की ट्रांजिस्टर जिससे वह समाचार सुना करते थे, लानटेन, छाता और न जाने उनसे जुड़ी कितनी चीजें पुस्तकालय में पड़ी हुई हैं। वो कहते हैं कि सरकार की तरफ से केवल एक दो कमरे बनाकर छोड़ दिये गयें हैं। सुरेश चंद जी से प्रेमचंद जी की चर्चा  शुरू हुई तो उन्होने कहा कि आप लोग एक लेखक के जन्मस्थली पर आये हुये हैं। वे कहा करते थे कि ” लिखते तो वो लोग हैं जिनके मन में दर्द हो, लगन हो अनुराग हो, विचार हो जिन्होने धन, भोग, विलास को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है वे क्या लिखेंगें ? ” सुरेश चंद जी बताते हैं कि यहां आने वाले लोग पूछते हैं कि प्रेमचंद जी कहानीकार कैसे हुये ? सच्चाई यह है कि समय के थपेड़ों ने प्रेमचंद को कहानी बनाया फिर वह कहानीकार बन गये। वो कहते हैं जाके पांव न फटी बिवाई सो का जाने पीर पराई सुरेश चंद जी कहते हैं कि प्रेमचंद जी ने बचपन से ही बहुत कुछ झेले थे, वो कहते हैं कि प्रेमचंद जी को तो बहुत बड़ा आवारा होना चाहिये थे इसलिये कि जब वह सात साल के हुये तो माता का साथ छूट गया और पंद्रह साल के हुये तो पिता का साथ छूट गया। यही वह लमही गांव का बाग बगीचा व खेत खलिहान हैं जहां व कबड्डी व गुल्ली डंडा खेला करते थे, आम तोड़ा करते थे गदा भांजा करते थे।  वो कहते हैं कि हमे तो यही लगता था कि बाल्मिकी ही एक आवारा थे जिन्होने रामायण की रचना की थी पर हम लमही वासियों को क्या  पता था कि उनके यहां भी एक वाल्मिकी जन्म ले चुके हैं। जो हिंदी के कालजयी रचनाकार बन चुके हैं और विश्व पटल पर छा चुके है। वो कहते हैं कि प्रेमचंद एक देश भक्त और समाज सुधारक दोनो थे। प्रेमचंद एक उपान्यासकार, कहानीकार, पत्रकार, नाटककार, चित्रकार, फिल्मकार, अनुवादकार सभी थे। उन्होने पंद्रह उपन्यास व चार सौ कहानियां लिखे। 
सुरेश चंद जी कहते हैं की मौत ने किसको छोड़ा है मौत ने प्रेमचंद को भी नहीं छोड़ा 8 अक्टूबर 1936 को वह हम देशवासियों से विदा हो गए ।  वह कहते हैं कि आज मैं प्रेमचंद जी के किस कहानी की चर्चा करूं किस उपन्यास की चर्चा करूं क्योंकि प्रेमचंद ने नारी समस्या पर भी जबरदस्त लेखनीं चलाई है। जिसमें है कि ”निर्मला” दहेज का दानव निर्मला की जिंदगी को निगल गया वह बेचारी समझ ही नहीं पाई। आज अभियान चलाया जा रहा है बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जबकि प्रेमचंद आज से सवा सौ साल पहले यह अभियान चला चुके हैं। वह कहते हैं कि आज ऐसा कोई घर नहीं है जहां प्रेमचंद जी की निर्मला न हो,। प्रेमचंद जी ने नारी के उन हालातो को देखा है कि जहां उन्हें एक चौखट से बांध दिया जाता था। आज प्रेमचंद की कलम के सहारे निर्मला उस चौखट को डाक चुकी है और अपने अधिकारों को मांग रही है वह राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल बन रही है फाइटर प्लेन उड़ा रही है, लेकिन फिर भी उसे निर्मला के सामने तमाम समस्याएं हैं जिस लड़ाई में निर्मला खुद है प्रेमचंद के समय में वह समस्याएं नहीं थी जो आज है । अगर आज किसी को पता चल जाए कि प्रेमचंद की निर्मला कोख में आ गई है तो डॉक्टर से अल्ट्रासाउंड कराकर उसकी आवाज को खामोश कर दिया जाता है, कोख ही कब्र बन जाती है। जबकि एक मां बनना चाहती है जबकि एक मां कहना चाहती है एक संसार बसाना चाहती है संसार देखना चाहती है लेकिन हाय रे समय की मार, न एक मां बन पाई, न एक मां कह पाई, और न एक मां देख पाई 
वह कहते हैं कि प्रेमचंद की एक कहानी है बूढ़ी काकी, आज बुढ़ी काकी पर एक अभियान चलाया जाता है प्रेमचंद जी आज से सवा सौ साल पहले इस पर लेखनी उठाई थी। वे कहते हैं आज वो बुढ़िया किसी सीढ़ी के नीचे, या किसी झोपडी में खामोश तस्वीर की तरह बैठी रहती है , ये बच्ची तनी पानी दे दा लाल, ये बच्ची तनी पनिया दे दा लाल कह कर दिन भर वो घिघियाती रहती है और उसे झिड़क दिया जाता है, चुप रहा तोहार त दिन भर लगल रहेला। जो बूढी काकी जिंदगी  चाहती रही वह भगवान से मौत मांगती हैं। जो घर की आबरू थी आज आबरू को ही घर से निकाल दिया गया। जो दादियां हमें कहानी सुनाया करती थी आज उन दादियों की कहानी सुनाई जा रही है। यह कईया दादिया घरों में एकांत बैठी रहती है और कोसती रहती हैं कि है भगवान अगर आप में शक्ति हो तो हमें उठा लीजिए। वह वृद्धा और विधवा आश्रम जाने को मजबूर है। यह आवाजें  अक्सर सुनने को मिल जाया करती हैं कि अगर आज हमार रमऊं रहत त हमें ई दिन देख के ना पड़त। यह कानों से सुना जाता है और आंखों से देखा जाता है प्रेमचंद जी ने हालातो को देखा और उसे जबरदस्त तरीके से अपनी लेखनी चलाई।
सुरेश चंद जी धारा प्रवाह एक से बढ़कर एक प्रेमचंद जी के उपन्यासों की चर्चा किये। एक सुमन बिटिया के सुमन बाई बनने की कहानी  पर आधारित उपन्यास सेवा सदन का उन्होने मार्मिक वर्णन किया और बताया कि यही वह उपन्यास जिस पर शरत चंद चटोपाध्याय ने उन्हे उपन्यास सम्राट की उपाधि से विभूषित किया जो केवल मौखिक रूप से ही मिला है। वे कहते हैं ऐसे कालजयी रचनाकार को केवल मौखिक रूप से सम्मानित करके छोड़ दिया गया। क्या यह प्रेमचंद जी का अधूरा सम्मान नही है।  सुरेश चंद अपने परिश्रम से एक कमरे के पुस्तकालय को चलाते हैं और सरकार की तरफ आशा भरी निगाहें से टकटकी लगाये हुये हैं कि प्रेमचंद के अधूरे सम्मान की कहानी को सुखांत करते हुये वर्तमान सरकार क्या लमही में स्मारक बनाने की राह की अड़चनों को दूर करेगी। क्या मुंशी जी की जन्मस्थली पर एक विशाल पुस्तकालय आकार ले सकेगा। क्या प्रेमचंद जी का अधूरा सम्मान पूरा हो सकेगा या फिर जीवन के अंत तक त्रासदी और समस्याओं को झेलने वाले प्रेमचंद जी अपनी मृत्यु के 89 साल बाद भी किसी समस्या को लेकर ही चर्चा में रहेंगें। 
                                                                                                               

शोधकर्ता: प्रदीप कुमार तिवारी 
इस लघु शोध प्रबंध के लिये शोधकर्ता ने मुंशी प्रेमचंद जी के जन्मस्थान लमही तक की यात्रा की और कुछ तश्वीरें जुटाई जो इस शोध पत्र के साथ संलग्न है जो कि निश्चित रूप से संग्रहणीय है।



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