”धंधा“
’मां कसम अगर भगवान कभी पैसा दिया न तो उसके दोनो बच्चों को मै पाल लूंगा’ सिगरेट का गहरा कस लेकर नाक से ढेर सारा धूंआ छोड़ते मुन्नू मिश्रा ने कहा, प्रत्युत्तर में राजेश केवल हामी भर सका था।
चेत सिंह घाट पर बैठे मुन्नू दोबारा सिगरेट सुलगा लिया था। राजेश ने हिम्मत करके पूछा मुन्नू भईया आप आज बड़े अपसेट लग रहे हैं और किन बच्चों की बात कर रहे हैं ? किनको पाल लेंगंे। मुन्नू ने कहा कल अखबार नही पढ़े थे क्या ? पढ़ा तो था, भईया! राजेश ने जवाब दिया। मुन्नू ने कहा वो जो सिगरा पर हत्या हुई है न व्यवसाई की उसी के बच्चों की बात कर रहा हूं। कल पोस्टमार्टम हाउस गया था, उसकी पत्नी अपने दोनो बच्चों के साथ बिलख रही थी। बड़े मासूम थे, दोनो यतीम हो गये। आंख भरकर लाल हो गई थी मुन्नू की उसने तीसरा सिगरेट सुलगा लिया था। साला, हरामी है रफीकवा, मुन्नू ने बुदबुदाया ’हरामखोर’ ने कहा था कि डेढ़ लाख से पांच लाख की वसूली करता है मिला केवल पंद्रह सौ ! पंद्रह सौ के लिए हत्या करवा दिया हरामी । राजेश पूरा मामला समझ नही पा रहा था कि उस हत्या से मुन्नू का क्या मतलब है, और रफीक क्यों हत्या करवा दिया ? मुन्नू चौथी सिगरेट सुलगा चुका था, सिगरेट फूंकते-फंूकते वो बोले जा रहा था बस यही तमन्ना है राजेश भाई कि पैसा हो जायेगा तो बहन की शादी कर दूंगा फिर कोई चिंता नही रहेगी। दोनो के कदम चेतसिंह घाट से उठ गये थे वो अब कमरे की ओर बढ़ चले थे। पूरे रास्ते मुन्नू अपनी बहन और मां की बात करता रहा। बीच में बीच मंे यतीमों की मदद की भी बात करता जाता। कमरा आ गया था। मुन्नू उसे छोड़कर चला गया था। उस दिन के बाद से मुन्नू छह महीने दिखाई नही दिया। छह माह बाद से अचानक उसकी मुलाकात राजेश से अस्सी घाट पर हो गई। पतला दूबला मुन्नू खासा मोटा ताजा लग रहा था। अरे मुन्नू भाई आजकल आप दिख नही रहे हैं क्या बात है ? अचानक आप गायब हो गये ? लाज पर भी अब आप नही आते क्या बात है सब ठीक है न ? आओ राजेश चाय पी लो, मुन्नू ने कहा, राजेश मुन्नू के पास खिसक आया दोनों में बातें होने लगी। कहां थे मुन्नू भाई ? राजेश ने फिर पूछा अबकी बार मुन्नू का मुंह खुला कहा राजेश भाई, किसी का विस्वास करने लायक नही है। साला जिस पर विस्वास करो वही दगा दे जाता है। मेरी आनंद से खटक गई है, कहकर तफसील से मुन्नू बताने लगा। मुन्नू ने सिगरेट सुलगा ली थी और हल्के कदम से घाटों की सीढ़ीयों की ओर बढ़ चला राजेश भी साथ चलता जा रहा था। उसके मन में उत्सुकता बढ़ती जा रही थी, आखिर क्या हुआ दोनो में जो इतना खटक गई। मुन्नू अपनी रौ मंे कहता जा रहा था। राजेश भाई किसी ने कहना मत हम लोग एक ’धंधा’ करते हैं रफीकवा हमारा मुखबीर है। रफीक बताता है कि किस आदमी के पास माल है हम उसे टारगेट करते हैं। छठ मईया की पूजा के एक दिन पहले हमे रफीकवा ने बताया कि एक व्यवसाई जो डेढ़ से पांच लाख की वसूली करके अपने घर जाता है सिगरा के पास टारगेट करना है। मैने स्पाट बिछाया जब व्यवसाई आ गया तो हमने उसे कट्टा सटाकर रूपये का भरा बैग छीनने लगे वो जिद पर आ गया और हमसे भिड़ गया मैने अपने कट्टे को उसकी कनपटी पर सटाकर गोली मार दी। हम लाज आ गये, और पूरा बैग खोले तो महज 1500 रूपया मिला मुन्नू ने गहरी सांस ली और थोड़ा रूककर बोला, व्यवसाई के दो छोटे-छोटे बच्चे हैं ंएकदम मासूम, प्यारे से उसकी पत्नी पोस्टमार्टम हाउस पर उन दोनो को लेकर साथ आई थी, रफीकवा की वजह से मासूम यतीम हो गये। पुलिस को भनक लग गई थी सो वो मेरे पीछे पड़ी थी मैने आनंद से कहा कि अपने पिता से कहकर मुझे जेल से बचा लो लेकिन आनंद ने साथ नही दिया। मुझे पुलिस पकड़ ले गई मैं छह महीने से जेल में था। जमानत पर आया हूं,नशा पानी से दूर इसलिये मोटा हो गया हूं। राजेश के आंखों के सामने पूरा दृश्य किसी सिनेमा की तरह चलने लगा। कसम खाता हूं राजेश भाई, आनंदवा को छोड़ूंगा नहीं पहले अपराध करवाता है, और जब जरूरत आती है तो मदद करने के बजाय भाग जाता है। किस काम की उसके बाप की नेतागीरी, आखिर हम उसके लिये काम ही क्यों करेें ? धंधे मंे बराबर का हिस्सा लेता है, जब उसने जिम्मा लिया था तो पुलिस को मैनेज करना चाहिये था उसको कहते-कहते मुन्नू की आंख सूर्ख लाल हो चुकी थी। अब राजेश को डर लगने लगा कि वो पिछले दो घंटे से एक ऐसे हत्यारे के साथ है जिसने दो मासूमों को यतीम बना दिया था। यह तो एक कांड था जिसे उसने बताया न जाने अब तक कितनों की यह हत्या कर चुका होगा। राजेश की बोलती बंद हो चुकी थी, लेकिन वो मुन्नू के साथ चलता रहा। मुन्नू अपनी रौ में कहे जा रहा था बस राजेश भाई बहन की शादी कर लूं फिर देखता हूं सबको। अस्सी घाट से हरिश्चंद्र घाट आ चुका था राजेश कहा मुन्नू भाई अब मेरा रूम आने वाला है, मैं जाऊं ? ठीक है जाईये लेकिन जितना बताया हूं किसी से कहियेगा नही अपने तक ही रखियेगा। मुन्नू की इस बात में धमकी का पुट था, राजेश ने हामी में सिर हिला दिया। उस दिन के बाद मुन्नू फिर राजेश से कभी मिला नही लेकिन एक दिन उसने एक खबर अखबार में पढ़ी कि भेलूपुर के निकट एक नाले के पास रफीक की लाश मिली थी जिसे किसी ने ईंट से कूंच-कूंच कर मार डाला था। राजेश का मन अंदर से कहने लगा कि यह जरूर मुन्नू का काम होगा लेकिन वो अपने मनोभावों को दबा गया। आनंद आज कुछ ज्यादा ही अपसेट था आज उसके लाज में कुछ नये चेहरे आये थे, बगल के ठेले से कलेजी भी आई थी बोतल भी खुली थी लेकिन उसका पीने में मन नही लग रहा था। रफीक की हत्या ने उसे अंदर से कंपा दिया था। उसे नये भरोसेमंद साथियों की जरूरत थी और अपनी जान की फिक्र भी। आज तक उसने अपने जितने साथियों को मदद का भरोसा देकर स्पाट पर चढ़ाया था और बाद मंे अपने वादे से मुकर गया उनका डर था सो अलग। मुन्नू मिश्रा अब मुन्नू पंडित के नाम से मशहूर हो चला था।
आनंद भाई, आप बोलो तो करना क्या है ? हम सब कर लेते हैं नये चेहरों ने आवाज दी। इनमें से एक का नाम साकिब था और एक का नाम कलुआ पासी था। “किसी की जान लिये हो कभी?” आनंद बोला, वे एक दूसरे को देखने लगे। उन्होनें “नही” में सिर हिला दिया। आनंद बोला देखो यह एक धंधा है जिसमंे जान का सौदा होता है। कलेजे में दम हो और पिछवाड़े में बूता तभी हामी भरना और हां एक बात अपने भेजे में जरूर बैठा लेना कि गद्दारी किसी भी कीमत पर मंजूर नही है। साकिब और कलुआ जल्द ही आनंद के गिरोह के खासमखास प्यादे हो गये। इधर मुन्नू को लेकर आंनद काफी सजग रहता था क्या पता वो कब पलटवार कर दे। कहीं भी आता-जाता तो पहले पूरी तरह से मुतमईन हो लेता उसके जान पर कोई खतरा न हो तभी वह कदम बढ़ाता। काशी मंे होली का खुमार चरम पर था, तीन दिन पहले से बोतल पर बोतल कलेजी अंडे का चिखना पूरा माहौल रंगीन हो रखा था। वह मार्च महीने की एक गुनगुनी सुबह थी। कलुआ और साकिब ने आनंद को बताया कि एक स्पाट है मालदार आसामी है दिन भर वसूली करके शाम को घर लौटता है अच्छी खासी रकम साथ मंे लेकर चलता है, स्पाट भी बहुत दूर नही होगा भेलूपुर थाने से आगे बढ़कर विजया सिनेमा से बायें मुड़कर भगवान किनाराम आश्रम होते हुये बीएचयू की ओर जाने वाले रास्ते पर एक गली मंे उसका घर है। साकिब ने बताया कि गली सुनसान रहती है आनंद भाई आज ही स्पाट लगा लेते हैं। आनंद ने कहा कम से कम पांच आदमी चाहिये। दो बकरे के लिये तीन रेकी के लिये, और तुम केवल दो हो। कलुआ पासी ने कहा अरे !् आनंद भाई आप भी तो हैं, सारा काम हम करेंगें आप बस गली के मुहाने पर निगरानी करियेगा और काम होते ही निकल लीजियेगा। आनंद हाथ मारने का मौका जाने नही देना चाहता था वह तैयार हो गया। शाम को जब सूरज बादलों की आगोश में सो गया घड़ी की सुईयां शाम के 7 बजे को पार कर गई,पूरी फिल्डिंग सज गई। सब कुछ प्लान के तरीके से हो रहा था कलुआ और साकिब उस आदमी के पीछे लग हुये थे। हेलमेट लगाये वह शख्स आनंद के पास से गुजरा, आनंद को वो शख्स जाना पहचाना लगा, आनंद अभी सोच ही रहा था कि पीछे से कलुआ पासी और साकिब आ गये। वो शख्स जिसके शिकार के लिये आनंद ने फिल्डिंग लगाई थी वो भी रूक गया, आनंद गली के मुहाने पर ही था वह कलुआ और साकिब को देख रहा था और सोच रहा था कि आखिर बात क्या है कलुआ और साकिब कुछ कर क्यों नही रहे हैं ? तभी हेलमेट लगाये शख्स ने जो काला बैग लिये हुये था अपना हेलमेट उतारा उसे देखकर आनंद की धिग्गी बंध गई वह अपनी बाइक को जोर से किक मारा और बाइक स्टार्ट कर भागना चाहा तभी काले बैग से निकली 9 एम एम की पिस्टल गरज चुकी थी। कलुआ और साकिब के हाथों में भी पिस्टल थी एक गोली सीधे आंनद के पैर में लगी वह गिर पड़ा, कमर मंे खोसी अपनी पिस्टल निकालकर घिसटते हुये वह फायर करना चाहा, तभी एक गोली उसके पेट मंे लगी वह अधमरा हो गया, फिर भी उसने कलुआ और साकिब को ललकारा कि यह मुन्नू पंडित है इस पर फायर करो नही तो मार डालेगा। कलुआ और साकिब हंस रहे थे। साकिब ने कहा आनंद भाई यह धंधा है, कौन किसका स्पाट लगा दे पता ही नही चलता, आपने बहुतांे को स्पाट पर चढ़ाया आज आप की बारी थी। घसीट रहे आंनद के सीने पर मुन्नू ताबड़तोड़ फायरिंग किये जा रहा था मानों कई जन्मों की दुश्मनी की साध आज पूरी हो रही थी। गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा इलाका गूंज गया। कलुआ और साकिब बनारस की गलियों में गुम हो चुके थे। पुलिस मुन्नू पंडित की तलाश पूरी सरगर्मी से कर रही थी लेकिन उसके हाथ खाली थे।
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Nice
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छी कहानी है
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