"थोड़ा सा प्यार"
प्रिया रात के अंधेरे में खिड़की के पास खड़ी थी। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। उसके दोनों बच्चे — 7 साल का आर्यन और 5 साल की मीरा — सो चुके थे। छोटे-छोटे हाथों से अभी घर संभालना तो दूर, खुद को भी संभालना उनके बस की बात नहीं थी। प्रिया की आँखों में आंसू थे, जो बारिश की बूंदों की तरह चुपके-चुपके गिर रहे थे।
उसके पति, अजय, पिछले हफ्ते दिल्ली से 1200 किलोमीटर दूर पुणे के ऑफिस प्रोजेक्ट पर चले गए थे। विदेश जाने की बात थी, लेकिन कंपनी ने आखिरी वक्त पर प्लान बदल दिया। अब वो 6 महीने तो कभी एक साल में सिर्फ कुछ दिनों के लिए ही घर आ पाते थे। प्रिया अकेली रह गई थी — बच्चों की देखभाल, घर की जिम्मेदारी, और सबसे बड़ी... अपने दिल की लड़ाई।
जब राहुल से उसकी मुलाकात हुई थी, तब सब कुछ बहुत innocent था। राहुल उसके विभाग में काम करता था, विभाग के एक समारोह के दौरान उन दोनों की मुलाकात हुई।
प्रिया के केयरिंग नेचर और गंभीर स्वभाव में राहुल का मन मोह लिया था । प्रिया भी राहुल की संवेदनशीलता तथा पर्सनेलिटी पर आकर्षित हो चुकी थी
धीरे-धीरे बातें बढ़ीं, सहारा मिला, और एक दिन प्रिया ने महसूस किया कि वो राहुल के बिना अधूरी सी लगने लगी है।
रातें अब पहले जैसी नहीं रहीं।
जब बच्चे सो जाते, प्रिया अकेली बिस्तर पर लेटकर राहुल के मैसेज पढ़ती। दिल तेज़ धड़कता। फिर अचानक एक गहरी उलझन घेर लेती —
**“ये पाप है या पुण्य?”**
वो खुद से पूछती,
“मैं माँ हूँ। मैं पत्नी हूँ। फिर भी किसी और के लिए इतना महसूस करना... क्या ये गुनाह नहीं?”
पर फिर राहुल की याद आती — उसकी वो मुलायम आवाज़, जिसने महीनों बाद उसे “महसूस” कराया था कि वो भी एक औरत है। अजय के चले जाने के बाद जो खालीपन था, राहुल ने उसे भर दिया था।
प्रिया आंसू पोछते हुए सोचती,
“क्या भगवान मुझे माफ करेंगे? या ये भी एक तरह का पुण्य है — खुद को जीने का, खुश होने का?”
दिल दोनों तरफ खिंचा जा रहा था — एक तरफ बच्चों के छोटे-छोटे चेहरे, अजय की यादें, और समाज का डर... दूसरी तरफ राहुल के साथ वो सुकून, जो उसे सालों बाद मिला था।
वो अक्सर खुद को समझाती,
“मैं कुछ गलत तो नहीं कर रही... बस थोड़ा सा प्यार चाहती हूँ।”
पर दिल जानता था — ये “थोड़ा सा” अब बहुत हो चुका था।
-धीरे-धीरे रोज़ ऑफिस में छोटी-छोटी बातें, चाय के कप के साथ हंसी, और फिर फोन पर लंबी बातें। प्रिया को राहुल की समझदारी और संवेदनशीलता बहुत भाती थी। राहुल को प्रिया में वह शांति मिलती थी जो घर में कभी नहीं मिली।
एक शाम, ऑफिस के बाद दोनों ने पार्क में मुलाकात की। सिर्फ बातें हुईं। हाथ तक नहीं छुए। प्रिया घर लौटते वक्त मुस्करा रही थी। उस रात उसने डायरी में लिखा, “आज बहुत दिनों बाद मन हल्का लगा।”
लेकिन जैसे ही सब कुछ गहरा होने लगा, प्रिया के पति अजय अचानक से वापस आ गए। अब प्रिया का घर फिर से पूरा हो गया था। पति के साथ रहते हुए वह राहुल से बात नहीं कर पाती। ऑफिस में भी दोनों एक-दूसरे को सिर्फ औपचारिक मुस्कान भर दे पाते। पर दोनों के मन में हर पल एक-दूसरे की छवि घूमती रहती। प्रिया से अगर कभी राहुल की बात हो जाती तो प्रिया की उलझने और कशमकश उभर कर बाहर आ जाती वह एक ऐसी महिला बनकर रह गई थी जो न पति से दूर हो पा रही थी और न प्रेमी को अपना पा रही थी।
राहुल प्रिया की उलझन को समझ रहा था। एक दिन उसने प्रिया को एक पत्र लिखा:
प्रिया..
यार, अगर मुझसे दूर होने से तुम्हारी जिंदगी फिर से पटरी पर लौट आती है तो बिना सोचे मुझसे दूर हो जाना।
मैं तुम्हारी उलझन और कशमकश को समझता हूं...और शायद तुम भी मुझे समझती हो..
शादीशुदा होने के बाद भी अगर किसी से प्रेम हो जाए, तो उसे हर बार पाप समझना कितना सही है ?
क्या विवाह यह बंधन तय कर देता है कि तुम्हे केवल और केवल उसी व्यक्ति से प्रेम करना है जिससे तुम्हारा विवाह हुआ है।
मै तो इतना महसूस करता हूं कि यह एक अनोखा एहसास है जो सबके साथ नहीं होता किसी खास के साथ ही यह एहसास होता है।
क्या पंडितों के कुछ मंत्र प्रेम जगा देते हैं ? क्या प्रेम किसी पुरोहित मंत्रों का गुलाम है ? अगर ऐसा है तो मीरा को कृष्ण से प्रेम क्यों हुआ?
कुछ रिश्ते किस्मत से नहीं, दिल की गहराइयों से जुड़ते हैं।
जिसे तुम दुनिया से छुपाकर रखते हो, वो कोई खेल नहीं, बल्कि एक सच्चा एहसास होता है।
लोग चाहे तुम्हें या मुझे बेवफ़ा कहें, पर हर अधूरा रिश्ता गलत नहीं होता।
कुछ प्रेम राधा-कृष्ण जैसे होते हैं—अधूरे ज़रूर, मगर सबसे पवित्र!!
—तुम्हारा राहुल
प्रिया ने पत्र पढ़ा तो उसकी आँखें भर आईं। वह अपने कमरे में बैठकर रोई। शाम को उसने जवाब लिखा:
“कल आपसे बात करने के बाद सारे दिन जब भी आपकी याद आई आंखे भर जा रही थी...पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि हम दूर होते जा रहे हैं, अभी भी मैं ये लिख रही हु तो मेरी आंख नम है...
शायद हमारी बाते नहीं हो पा रही,,, ठीक से या फिर..... अनजान सा डर बन गया है,,, हम दूर बहुत दूर होते जा रहे है....”
—प्रिया
इसके बाद दोनों ने कई बार कोशिश की, लेकिन बातचीत असंभव होती जा रही थी। प्रिया के पति घर पर थे। राहुल की पत्नी को भी शक होने लगा था। समाज, परिवार, बच्चे — सब कुछ उनके बीच दीवार बन गया।
एक शाम ऑफिस की छत पर दोनों आखिरी बार मिले। प्रिया की आँखें नम थीं। राहुल ने कहा, “मैं तुम्हें कभी नहीं भूल पाऊंगा।” प्रिया ने सिर्फ सिर हिलाया। कोई वादा नहीं, कोई योजना नहीं। बस एक लंबी खामोशी।
समय के साथ दोनों ने अपनी जिम्मेदारियों को प्राथमिकता दी। राहुल अपनी पत्नी और बच्चों के साथ समझौता कर लिया। प्रिया अपने पति के साथ सामान्य जीवन जीने लगी।
प्रेम को समाज कभी स्वीकार नहीं करता। चाहे वह कितना भी पवित्र क्यों न हो, अंत में अधूरापन ही उसका साथी बन जाता है। राहुल और प्रिया भी बिछड़ गए — सिर्फ यादों और एक पत्र के सहारे।
कभी-कभी ऑफिस के गलियारे में उनकी नजरें मिलती हैं, मुस्कान आती है, और फिर दोनों मुड़ जाते हैं। क्योंकि कुछ कहानियाँ पूरी होने के लिए नहीं लिखी जातीं।
....…...............प्रदीप............................

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