”धंधा“

’मां कसम अगर भगवान कभी पैसा दिया न तो उसके दोनो बच्चों को मै पाल लूंगा’ सिगरेट का गहरा कस लेकर नाक से ढेर सारा धूंआ छोड़ते मुन्नू मिश्रा ने कहा, प्रत्युत्तर में राजेश केवल हामी भर सका था।

 हरिश्चंद्र घाट से टहलते-टहलते दोनो चेत सिंह घाट चले आये थे। बनारस के घाट शाम हो या सुबह टहलने का एक अलग ही आनंद देते हैं। एक घाट से सटा दूसरा घाट कब आ जाता है, पता ही नही चलता, देशी और विदेशी सैलानियों को निहारते निहारते राह कट जाती है। दोनो चेत सिंह घाट पर बैठ गये, राजेश की उत्सुकता बड़ी जबरदस्त थी लेकिन वो कुछ पूछ नही पा रहा था। राजेश चाह रहा था कि मुन्नू डिटेल से बताये लेकिन एक अन्जाना सा खौफ व मुन्नू का शातिरपना मुन्नू को राजेश के सामने खुद को खोलने से रोके हुये था। राजेश आजमगढ़ जनपद का रहने वाला था, वो बनारस एमसीए की तैयारी करने गया था। रवींद्रपुरी कालोनी में एक कोचिंग ज्वाइन कर वो कालोनी से सटे एक मुहल्ले में कमरा लेकर रहने लगा था। कोचिंग जाने की राह पर बना बाबा कीनाराम का आश्रम उसे आकर्षित करता था। आश्रम से सटे ही बस्ती थी जिसकी टेढ़ी मेढ़ी गलियों में दो चार कदम चलने के बाद उसका रूम आ जाता था। अंडर ग्राउंड जैसी घर के उपरी माले पर मकान मालिक और उनका परिवार रहता था, नीचे के आठ कमरे किराये पर देने के लिए रखे थे। मकान मालिक परिवार वालांे व लड़कियांे को कमरा नही देते थे उनके लॉज मंे केवल लड़के रहते थे। विविध पृष्ठभूमियों से अलग-अलग जनपदों से आये लड़के जो कुछ बनने की ललक लिये अलग-अलग संस्थानों में तैयारियां करते इन युवाओं में आत्मीयता हो जाती थी। इन आठ कमरों में छह में हमेशा लड़के रहते थे लेकिन दो कमरे मकान मालिक के लिये रिजर्व थे। मकान मालिक का बेटा आनंद सिंह इनकी व्यवस्था देखता था। किराया भी सभी लड़के आनंद को ही देते थे। आनंद का सभी युवकों से दोस्ताना व्यवहार था। शाम होेते ही कुछ युवक जो अक्सर जिंस, टी शर्ट और स्पोर्ट के जूते में होते थे आ जाते थे। आनंद के साथ उनका पीने पिलाने का दौर चलता था। कभी चिखना के रूप में कलेजी होती तो कभी अंडा वो अपने रूम में खाते पीते लेकिन जब शराब के लिये पानी की जरूरत होती तो वो किसी न किसी लड़के के रूम का दरवाजा खटखटा देते। लड़के सुबह ही पीने का पानी जलकल विभाग की सप्लाई से भर कर रखते थे। आंनद व उनके साथी लॉज के लड़कों के साथ घुल मिल कर इस तरह से रहते थे जैसे कि वो भी तैयारी करने वाले ही हों लेकिन उनके हाथों में किसी ने कोई किताब या कलम नहीं देखी थी। शाम ढले पांच छह युवकों की बैठकी आनंद के लिये रिजर्व किसी न किसी कमरे में हो जाती थी। राजेश कभी उन कमरांे के पास से गुजरना होता तो उत्सुकतावस नजर डाल ही देता था पूरा कमरा धूयें से भरा रहता था । सिगरेट का पूरा पैकेट ही वह टीम खाली करने पर उतारू रहती। आनंद के पिता का किताबों का एक बिजनेस था। इंडियन माइथोलाजी व भारतीय संस्कृति से भरी पड़ी हजारों किताबों की श्रृंखला ऐसी विदेशियों को खूब आकर्षित करती जो बनारस घूमने आये हों और उन्हे भारतीय संस़्कृति को समझने की चाहत होती थी। आनंद के पिता का खासा दबदबा और राजनैतिक रसूख था उनके मकान के सामने ही एक पंडित जी का मकान था। जहां से रोज लड़ने झगड़ने की आवाज आती थी। पंडित के घर में एक खूबसूरत सी लड़की थी जो काम करने में ही व्यस्त रहती थी मौका पाकर लॉज में आने जाने वाले लड़कों को निहार लेती। लड़के भी लॉज के गेट के बाहर गुनगुनी धूप सेकने के बहाने झुण्ड बनाकर खड़े होते तो उसे देखने की लालसा मन में हिचकोले लेते रहती थी। पंडित जी से सटा ही एक मुसलमान का मकान था जिसे पप्पू बमबाज के नाम से लोग जानते थे। खुद के नाम से बमबाज जोड़ा जाना उसे अच्छा लगता था। बाहरी लड़के उसकी चापलूसी में पप्पू भाई कहते रहते थे। अगर कोई उसके नाम के साथ बमबाज जोड़ देता तो उसका सीना दो इंच गौरव से और फूल जाता था। पंडित जी के पिता जी प्रोफेसर थे, वो अपने बेटे की रोज-रोज की शिकायतों से जब तंग आ गये तो एक दिन उन्होने अपने बेटे को बुलाया कहा बेटा, मै एक अध्यापक हूं समाज में मेरा बड़ा नाम है, इज्जत है और तुम मेरे एकलौते बेटे हो आखिर क्यों ऐसी गुस्ताखियां करते हो जिससे पूर्वजों का नाम मिट्टी में मिलता जा रहा है, अरे बेटा अच्छे लड़के बनके रहो समाज में मान प्रतिष्ठा बढ़ेगी । यह सारी धन सम्पत्ति आखिर तो तुम्हारे लिये ही है न! पंडित जी ने कहा कि ठीक है पिता जी आज से आपका यह बेटा जिसके लिए आप धन सम्पत्ति जुटा रहे हैं बिल्कुल अच्छा बनके दिखायेगा। पंडित जी ने उसी दिन से अपना पैंट और कमीज निकाल कर फेंक दिये और गेरूआ वस्त्र धारण कर लिये। उन्होने साधू बनने की ठान ली, घर- बार छोड़ दिया। मंदिर-मंदिर घूमने लगे, सुबह गंगा स्नान के बाद एक लोटे में जल भरकर काशी की गलियों मंे ऐसे शिवलिंग जिन्हे मंदिर नसीब नही हुआ उन पर जल चढ़ाते फिरते, भूख लगती तो मांग कर खा लेते। प्रोफेसर साहब के एकलौते बेटे के साधू बन जाने से प्रोफेसर साहब टूट गये, लाख मनाने के बाद भी पंडित जी नही माने। एक बार उनके पिता भी उनके पास गये कहे कि बेटा ये क्या किये तुमने, उन्होने कहा कि पिता जी आप ने ही तो कहा था कि अच्छे बनो मैं अब अच्छा बन गया तो अब आपको क्या दिक्कत है ? पिता जी निरूत्तर थे। एक प्रोफेसर का बेटा भीख मांग कर खाता है और किसी मंदिर की चौखट पर बिना दरी बिछौने के सो जाता यह देखकर सबको अचरज होता लेकिन करते भी क्या ? प्रोफेसर साहब और उनकी पत्नी की अंतिम बेला आई तो पंडित जी का मन पिघल गया। साधू गीरी में ही उन्हे यह ज्ञान हुआ था कि अगर मां, बाप की सेवा नही किये तो यह जन्म व्यर्थ है, सो उन्होने अंत समय में घर आने का निश्चय किया। वो नित्य की भांति गंगा स्नान करते लोटे में जल भरते हर कंकर को शंकर मानते अभिषेक करते अपने घर पहुंचते मां- बाप का कुशल क्षेम पूछते। मां, पिता के आवश्यक कार्य निपटाते फिर निकल लेते अपने दैनिक दिनचर्या पर। वो पंडित जी जब घर आते लॉज के बाहर खड़े लड़के बाबा को खूब जोर से नमस्कारी करते, लड़को की नमस्कारी से प्रसन्न बाबा एक -एक फूल या तुलसी दल सबके हाथो पर रख देते यही प्रसाद होता था। लड़कांे की आवाज सुन पंडित जी के घर की लड़की जो संभवतः उनकी रिश्तेदारी में थी की छत से लेकर नीचे तक आवाजाही तेज हो जाती लड़के भी नैनसुख ले अपने प्रफुल्लित हृदय से अपने कार्य की ओर बढ़ जाते थे। समय के साथ मां - बाप चले गये, लेकिन पंडित जी ने घर आना नही छोड़ा था। वह लड़का जो अक्सर आनंद के साथ रहता था उसका नाम मुन्नू मिश्रा था। पतला, दुबला छरहरा बदन, हीरो जैसे बाल, स्पोर्ट का जूता जिंस और टी शर्ट यही उसका पहनावा था। जिस दिन वो नहा धो कर अच्छे से बन संवर कर आता तो किसी बड़े खानदान का लगता। उसका पूरा दिन लाज के कमरे में ही बीत जाता, कभी उसकी आंखे लाल सूर्ख रहती तो कभी चिंता से आतुर नजर आता, कभी डिप्रेशन में लगता। चूंकि वो लाज मंे सबसे ज्यादा रहता था और आनंद का दोस्त था इसलिये उसे भी लड़को द्वारा खासी इज्जत मिलती। वो सुबह ही लाज के कमरे मंे आ जाता और आंनद का इंतजार करता, दिन के लगभग नौ या दस बजे छत से उतर कर आनंद जब नीचे कमरे में आता तो दोनो की मुलाकात होती, फिर शुरू होता सिगरेट का दौर कस पर कस चलते और कमरा धूयें से भर जाता। 11 बजे के लगभग रफीक उनकी टीम में शामिल होता। लगभग 5 फिट का रफीक सबसे उम्रदराज था लेकिन बालों में लगा खिजाब उसकी उम्र को ढक देता था। रफीक के पास पूरे इलाके की खबरें रहती किसकी कमाई कितनी है और कौन कहां आ जा रहा है, आजकल नया चल क्या रहा है ? सारी सूचनायें रफीक से मिल जाती। कभी - कभी शाम को आठ दस लवण्डे जुट जाते तो पूरा लाज उनके ठहाकों से गूंजता, थोड़ी देर मंे पीने पिलाने का दौर शुरू हो जाता। यह सारे लोग आनंद के पिता के रसूख की वजह से आनंद से जुटे थे। सबको यही गुमान था कि अगर कभी वो किसी काण्ड में फंसते हैं तो आंनद के पिता उन्हे छुड़ा लेंगें। आंनद कहता भी ऐसा था कि अरे यार, मैं हूं ना ! 

चेत सिंह घाट पर बैठे मुन्नू दोबारा सिगरेट सुलगा लिया था। राजेश ने हिम्मत करके पूछा मुन्नू भईया आप आज बड़े अपसेट लग रहे हैं और किन बच्चों की बात कर रहे हैं ? किनको पाल लेंगंे। मुन्नू ने कहा कल अखबार नही पढ़े थे क्या ? पढ़ा तो था, भईया! राजेश ने जवाब दिया। मुन्नू ने कहा वो जो सिगरा पर हत्या हुई है न व्यवसाई की उसी के बच्चों की बात कर रहा हूं। कल पोस्टमार्टम हाउस गया था, उसकी पत्नी अपने दोनो बच्चों के साथ बिलख रही थी। बड़े मासूम थे, दोनो यतीम हो गये। आंख भरकर लाल हो गई थी मुन्नू की उसने तीसरा सिगरेट सुलगा लिया था। साला, हरामी है रफीकवा, मुन्नू ने बुदबुदाया ’हरामखोर’ ने कहा था कि डेढ़ लाख से पांच लाख की वसूली करता है मिला केवल पंद्रह सौ ! पंद्रह सौ के लिए हत्या करवा दिया हरामी । राजेश पूरा मामला समझ नही पा रहा था कि उस हत्या से मुन्नू का क्या मतलब है, और रफीक क्यों हत्या करवा दिया ? मुन्नू चौथी सिगरेट सुलगा चुका था, सिगरेट फूंकते-फंूकते वो बोले जा रहा था बस यही तमन्ना है राजेश भाई कि पैसा हो जायेगा तो बहन की शादी कर दूंगा फिर कोई चिंता नही रहेगी। दोनो के कदम चेतसिंह घाट से उठ गये थे वो अब कमरे की ओर बढ़ चले थे। पूरे रास्ते मुन्नू अपनी बहन और मां की बात करता रहा। बीच में बीच मंे यतीमों की मदद की भी बात करता जाता। कमरा आ गया था। मुन्नू उसे छोड़कर चला गया था। उस दिन के बाद से मुन्नू छह महीने दिखाई नही दिया। छह माह बाद से अचानक उसकी मुलाकात राजेश से अस्सी घाट पर हो गई। पतला दूबला मुन्नू खासा मोटा ताजा लग रहा था। अरे मुन्नू भाई आजकल आप दिख नही रहे हैं क्या बात है ? अचानक आप गायब हो गये ? लाज पर भी अब आप नही आते क्या बात है सब ठीक है न ? आओ राजेश चाय पी लो, मुन्नू ने कहा, राजेश मुन्नू के पास खिसक आया दोनों में बातें होने लगी। कहां थे मुन्नू भाई ? राजेश ने फिर पूछा अबकी बार मुन्नू का मुंह खुला कहा राजेश भाई, किसी का विस्वास करने लायक नही है। साला जिस पर विस्वास करो वही दगा दे जाता है। मेरी आनंद से खटक गई है, कहकर तफसील से मुन्नू बताने लगा। मुन्नू ने सिगरेट सुलगा ली थी और हल्के कदम से घाटों की सीढ़ीयों की ओर बढ़ चला राजेश भी साथ चलता जा रहा था। उसके मन में उत्सुकता बढ़ती जा रही थी, आखिर क्या हुआ दोनो में जो इतना खटक गई। मुन्नू अपनी रौ मंे कहता जा रहा था। राजेश भाई किसी ने कहना मत हम लोग एक ’धंधा’ करते हैं रफीकवा हमारा मुखबीर है। रफीक बताता है कि किस आदमी के पास माल है हम उसे टारगेट करते हैं। छठ मईया की पूजा के एक दिन पहले हमे रफीकवा ने बताया कि एक व्यवसाई जो डेढ़ से पांच लाख की वसूली करके अपने घर जाता है सिगरा के पास टारगेट करना है। मैने स्पाट बिछाया जब व्यवसाई आ गया तो हमने उसे कट्टा सटाकर रूपये का भरा बैग छीनने लगे वो जिद पर आ गया और हमसे भिड़ गया मैने अपने कट्टे को उसकी कनपटी पर सटाकर गोली मार दी। हम लाज आ गये, और पूरा बैग खोले तो महज 1500 रूपया मिला मुन्नू ने गहरी सांस ली और थोड़ा रूककर बोला, व्यवसाई के दो छोटे-छोटे बच्चे हैं ंएकदम मासूम, प्यारे से उसकी पत्नी पोस्टमार्टम हाउस पर उन दोनो को लेकर साथ आई थी, रफीकवा की वजह से मासूम यतीम हो गये। पुलिस को भनक लग गई थी सो वो मेरे पीछे पड़ी थी मैने आनंद से कहा कि अपने पिता से कहकर मुझे जेल से बचा लो लेकिन आनंद ने साथ नही दिया। मुझे पुलिस पकड़ ले गई मैं छह महीने से जेल में था। जमानत पर आया हूं,नशा पानी से दूर इसलिये मोटा हो गया हूं। राजेश के आंखों के सामने पूरा दृश्य किसी सिनेमा की तरह चलने लगा। कसम खाता हूं राजेश भाई, आनंदवा को छोड़ूंगा नहीं पहले अपराध करवाता है, और जब जरूरत आती है तो मदद करने के बजाय भाग जाता है। किस काम की उसके बाप की नेतागीरी, आखिर हम उसके लिये काम ही क्यों करेें ? धंधे मंे बराबर का हिस्सा लेता है, जब उसने जिम्मा लिया था तो पुलिस को मैनेज करना चाहिये था उसको कहते-कहते मुन्नू की आंख सूर्ख लाल हो चुकी थी।  अब राजेश को डर लगने लगा कि वो पिछले दो घंटे से एक ऐसे हत्यारे के साथ है जिसने दो मासूमों को यतीम बना दिया था। यह तो एक कांड था जिसे उसने बताया न जाने अब तक कितनों की यह हत्या कर चुका होगा। राजेश की बोलती बंद हो चुकी थी, लेकिन वो मुन्नू के साथ चलता रहा। मुन्नू अपनी रौ में कहे जा रहा था बस राजेश भाई बहन की शादी कर लूं फिर देखता हूं सबको। अस्सी घाट से हरिश्चंद्र घाट आ चुका था राजेश कहा मुन्नू भाई अब मेरा रूम आने वाला है, मैं जाऊं ? ठीक है जाईये लेकिन जितना बताया हूं किसी से कहियेगा नही अपने तक ही रखियेगा। मुन्नू की इस बात में धमकी का पुट था, राजेश ने हामी में सिर हिला दिया। उस दिन के बाद मुन्नू फिर राजेश से कभी मिला नही लेकिन एक दिन उसने एक खबर अखबार में पढ़ी कि भेलूपुर के निकट एक नाले के पास रफीक की लाश मिली थी जिसे किसी ने ईंट से कूंच-कूंच कर मार डाला था। राजेश का मन अंदर से कहने लगा कि यह जरूर मुन्नू का काम होगा लेकिन वो अपने मनोभावों को दबा गया। आनंद आज कुछ ज्यादा ही अपसेट था आज उसके लाज में कुछ नये चेहरे आये थे, बगल के ठेले से कलेजी भी आई थी बोतल भी खुली थी लेकिन उसका पीने में मन नही लग रहा था। रफीक की हत्या ने उसे अंदर से कंपा दिया था। उसे नये भरोसेमंद साथियों की जरूरत थी और अपनी जान की फिक्र भी। आज तक उसने अपने जितने साथियों को मदद का भरोसा देकर स्पाट पर चढ़ाया था और बाद मंे अपने वादे से मुकर गया उनका डर था सो अलग। मुन्नू मिश्रा अब मुन्नू पंडित के नाम से मशहूर हो चला था। 

आनंद भाई, आप बोलो तो करना क्या है ? हम सब कर लेते हैं नये चेहरों ने आवाज दी। इनमें से एक का नाम साकिब था और एक का नाम कलुआ पासी था। “किसी की जान लिये हो कभी?” आनंद बोला, वे एक दूसरे को देखने लगे। उन्होनें “नही” में सिर हिला दिया। आनंद बोला देखो यह एक धंधा है जिसमंे जान का सौदा होता है। कलेजे में दम हो और पिछवाड़े में बूता तभी हामी भरना और हां एक बात अपने भेजे में जरूर बैठा लेना कि गद्दारी किसी भी कीमत पर मंजूर नही है। साकिब और कलुआ जल्द ही आनंद के गिरोह के खासमखास प्यादे हो गये। इधर मुन्नू को लेकर आंनद काफी सजग रहता था क्या पता वो कब पलटवार कर दे। कहीं भी आता-जाता तो पहले पूरी तरह से मुतमईन हो लेता उसके जान पर कोई खतरा न हो तभी वह कदम बढ़ाता। काशी मंे होली का खुमार चरम पर था, तीन दिन पहले से बोतल पर बोतल कलेजी अंडे का चिखना पूरा माहौल रंगीन हो रखा था। वह मार्च महीने की एक गुनगुनी सुबह थी। कलुआ और साकिब ने आनंद को बताया कि एक स्पाट है मालदार आसामी है दिन भर वसूली करके शाम को घर लौटता है अच्छी खासी रकम साथ मंे लेकर चलता है, स्पाट भी बहुत दूर नही होगा भेलूपुर थाने से आगे बढ़कर विजया सिनेमा से बायें मुड़कर भगवान किनाराम आश्रम होते हुये बीएचयू की ओर जाने वाले रास्ते पर एक गली मंे उसका घर है। साकिब ने बताया कि गली सुनसान रहती है आनंद भाई आज ही स्पाट लगा लेते हैं। आनंद ने कहा कम से कम पांच आदमी चाहिये। दो बकरे के लिये तीन रेकी के लिये, और तुम केवल दो हो। कलुआ पासी ने कहा अरे !् आनंद भाई आप भी तो हैं, सारा काम हम करेंगें आप बस गली के मुहाने पर निगरानी करियेगा और काम होते ही निकल लीजियेगा। आनंद हाथ मारने का मौका जाने नही देना चाहता था वह तैयार हो गया। शाम को जब सूरज बादलों की आगोश में सो गया घड़ी की सुईयां शाम के 7 बजे को पार कर गई,पूरी फिल्डिंग सज गई। सब कुछ प्लान के तरीके से हो रहा था कलुआ और साकिब उस आदमी के पीछे लग हुये थे। हेलमेट लगाये वह शख्स आनंद के पास से गुजरा, आनंद को वो शख्स जाना पहचाना लगा, आनंद अभी सोच ही रहा था कि पीछे से कलुआ पासी और साकिब आ गये। वो शख्स जिसके शिकार के लिये आनंद ने फिल्डिंग लगाई थी वो भी रूक गया, आनंद गली के मुहाने पर ही था वह कलुआ और साकिब को देख रहा था और सोच रहा था कि आखिर बात क्या है कलुआ और साकिब कुछ कर क्यों नही रहे हैं ? तभी हेलमेट लगाये शख्स ने जो काला बैग लिये हुये था अपना हेलमेट उतारा उसे देखकर आनंद की धिग्गी बंध गई वह अपनी बाइक को जोर से किक मारा और बाइक स्टार्ट कर भागना चाहा तभी काले बैग से निकली 9 एम एम की पिस्टल गरज चुकी थी। कलुआ और साकिब के हाथों में भी पिस्टल थी एक गोली सीधे आंनद के पैर में लगी वह गिर पड़ा, कमर मंे खोसी अपनी पिस्टल निकालकर घिसटते हुये वह फायर करना चाहा, तभी एक गोली उसके पेट मंे लगी वह अधमरा हो गया, फिर भी उसने कलुआ और साकिब को ललकारा कि यह मुन्नू पंडित है इस पर फायर करो नही तो मार डालेगा। कलुआ और साकिब हंस रहे थे। साकिब ने कहा आनंद भाई यह धंधा है, कौन किसका स्पाट लगा दे पता ही नही चलता, आपने बहुतांे को स्पाट पर चढ़ाया आज आप की बारी थी। घसीट रहे आंनद के सीने पर मुन्नू ताबड़तोड़ फायरिंग किये जा रहा था मानों कई जन्मों की दुश्मनी की साध आज पूरी हो रही थी। गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा इलाका गूंज गया। कलुआ और साकिब बनारस की गलियों में गुम हो चुके थे। पुलिस मुन्नू पंडित की तलाश पूरी सरगर्मी से कर रही थी लेकिन उसके हाथ खाली थे। 

(प्रदीप तिवारी )

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