आचार्य चंद्रबली पांडेय

आज आचार्य पं0 चन्द्रबली पाण्डेय की पुण्यतिथि है। हिन्दी के लिए आजीवन संघर्षरत रहने वाले उस मनीषी ने ही एक ऐसा वातावरण तैयार किया था जिसके फलस्वरूप हिन्दी आज राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन है। हिन्दी के लिए उनके मन में कितना प्रेम था, उनके इस कथन से जाना जा सकता है। 'मुझे विश्वास है कि जिस प्रकार महावीर के रोम रोम में राम का नाम अंकित था, मेरे जीवन के क्षण क्षण में हिन्दी की लगन की भावना निहित है।' पाण्डेय जी बहुत सादगीपसंद व्यक्ति थे। साधारण बनियान, देशी कुर्ता, धोती यही उनकी वेशभूषा थी। जूता नहीं पहनते थे। अग्नि में पकी हुई वस्तु का सेवन नहीं करते थे। वे केवल भिगोया हुआ चना, गेहूँ और कुछ कच्चे पके फल खाकर जीवन व्यतीत करते थे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1931ई0में एम0ए0(हिन्दी) की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात डी लिट के लिए स्वीकृत विषय, सूफी साहित्य 'पर विशेष अध्ययन किया और इस पर लगभग कार्य भी पूरा किया जा चुका था किन्तु उस समय की व्यवस्था के अनुरूप उनसे शोध प्रबंध अंग्रेजी में प्रस्तुत करने को कहा गया, जिसे उन्होंने राष्ट्रभाषा का अपमान बताते हुए ठुकरा दिया। वह आचार्य पं0रामचन्द्र शुक्ल के प्रिय शिष्य थे।जायसी ग्रन्थावली के द्वितीय संस्करण के सम्पादन में उनका भी सहयोग था। वह वर्ष 1949 ई0में हैदराबाद में हुए अ0भा0हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गए थे। उन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी में साठ से अधिक पुस्तकों की रचना की है। कचहरी की भाषा और लिपि , मुगल बादशाहों की हिन्दी, कुरान में हिन्दी, राष्ट्रभाषा पर विचार, एकता, विचार विमर्श, साहित्य सन्दीपनी, तसव्वुफ अथवा सूफीमत (शोध ग्रन्थ), तुलसीदास, तुलसी की जीवनभूमि, केशवदास, शूद्रक, कालिदास (शोध), अनुराग बांसुरी (सम्पादित) आदि उनके लिखे प्रमुख ग्रन्थ हैं। उनके पाण्डित्य और आलोचकीय वैशिष्ट्य को देखते हुए जाने माने भाषाशास्त्री सुनीति कुमार चटर्जी ने कहा था कि' उनके एक एक पंफलेट एक एक शोध के बराबर हैं।' आज नवीनता के भॅवजाल में लोग उन पुराने मनीषियों के योगदान को भूलते जा रहे हैं। पाण्डेय जी का जन्म आजमगढ़ जनपद के ग्राम सठियांव में 24अप्रैल 1904ई0को और देहावसान वाराणसी में 24जनवरी 1958 ई0को हुआ था।आज उस मनीषी की पुण्यतिथि पर उनकी स्मृति को शत शत नमन।

( जगदीश चंद्र बरनवाल कुंद जी के फेसबुक वाल से साभार)

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