कहानी आचार्य केशव चंद्र सेन की

 https://youtu.be/paf65WW_-ZY

राजा राममोहन राय ने 1828 में ब्रह्म सभा गठन किया जो आगे चलकर के 1830 में ब्रह्म समाज में परिवर्तित हो गया।अ द्वितीय ने1830 में अपनी पेंशन की समस्या के समाधान करने के लिए राजा राम मोहन राय को 'राजा' की उपाधि देकर के विलियम चतुर्थ के दरबार में इंग्लैंड भेजा। सत्येंद्र नाथ मजूमदार के अनुसार वे प्रथम हिंदू थे जो बिलायत गए। इंग्लैंड में ही 27 सितंबर 1833 को राजा राममोहन राय की मृत्यु हो गई और ब्रिस्टल इंग्लैंड में उनकी समाधि है । उनकी मृत्यु के पश्चात  ब्रम्ह समाज के सह संस्थापक रहे उद्योगपति द्वारिका नाथ टैगोर ने ब्रह्म समाज का कार्यभार संभाला यह रविंद्र नाथ टैगोर के दादाजी थे । 1846 तक ब्रह्म समाज से जुड़े रहे।  द्वारिका नाथ टैगोर के बेटे देवेंद्र नाथ टैगोर 1839 में तत्वबोधिनी सभा की स्थापना करके समाज सुधार का कार्य कर रहे थे । देवेंद्र नाथ टैगोर, गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर के पिता थे 1843 में ब्रह्म समाज की बागडोर देवेंद्र नाथ टैगोर के हाथों में आ गई और उन्होंने ब्रह्म समाज का पुनर्गठन किया विधवा पुनर्विवाह, बहुविवाह उन्मूलन,  नारी शिक्षा रैयतों की दशा को सुधारना इनके नेतृत्व में ब्रह्म समाज का उद्देश्य था और यह इसी के लिए आंदोलन करते रहें । 18 43 में इन्होंने अपनी तत्वबोधिनी सभा का ब्रह्म समाज में विलय कर दिया ऐसा सतीश चंद्र मित्तल की किताब बताती है । देवेंद्र नाथ टैगोर के प्रभाव से ईश्वर चंद्र विद्यासागर अक्षय कुमार दत्त जैसे विचारक भी ब्रह्म समाज के सदस्य बने जो  ब्रह्म समाज को इस ईसाईयत प्रभाव से दूर रखना चाहते थे वे कहा करते थे कि मुझे डर है कि कहीं यह हिंदू शब्द ही न भूल जाएं और अपने आप को विदेशी नाम से पुकारे । आधुनिक शिक्षा का पैरोकार होने के नाते ब्रह्म समाज पर अंग्रेजों और ईसाई धर्म का बहुत ही प्रभाव था 1846 में देवेंद्र नाथ टैगोर के पिता द्वारिका नाथ टैगोर की मृत्यु हो गई लेकिन ब्रह्म समाज में कट्टर आस्था के चलते देवेंद्र नाथ टैगोर ने अपने पिता की मृत्यु संस्कार में  भाग लेने से यह कर करके इंकार कर दिया कि या तो एक प्रकार की मूर्ति पूजा है जिससे इनकी काफी लोक निंदा हुई ।

महर्षि देवेंद्र नाथ टैगोर के कार्यकाल के समय ही 19 वर्ष का एक युवा इनके संपर्क में आया जिसका नाम केशव चंद्र सेन था देवेंद्र नाथ टैगोर ने उसे ब्रह्म समाज का सदस्य बना लिया। 

केशव चंद्र सेन का जन्म 19 नवंबर 1838 को कोलकाता में हुआ था इनके दादा जी का नाम राम कमल सेन था जो कि दीवान थे और उनके पिता का नाम प्यारे मोहन था । केशव चंद्र सेन बचपन से तेज बुद्धि के थे तार्किक बुद्धि के थे।लड़ने झगड़ने में इनकी रूचि नहीं थी यह अकेले में चिंतन किया करते थे विद्वान थे एक दिन संजोग से इनके हाथ में राजनारायण बसु की एक लिखित किताब ब्रह्मवाद क्या है हाथ लग गई उन्होंने इस किताब का अध्ययन किया इसके बाद वह महज 19 वर्ष की अवस्था में ब्रह्म समाज के सदस्य बन गए युवा जोश से भरपूर आधुनिक सोच के मालिक केशव चंद्र सेन ने बहुत तेजी से ब्रह्म समाज का प्रचार प्रसार किया।  केशव चंद्र सेन के प्रभाव से हजारों लोग ब्रह्म समाज के सदस्य बने उसकी शिक्षाओं को मानने लगे उनके प्रयासों को देखते हुए महर्षि देवेंद्र नाथ टैगोर ने उन्हें आचार्य बना दिया, तथा ब्रह्मानंद की उपाधि दी आचार्य केशव चंद्र सेन पूरे देश में घूम घूम कर के ब्रह्म समाज का प्रचार प्रसार करने लगे इन्हीं की प्रेरणा से  स्वामी दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश को हिंदी में लिखा महाराष्ट्र में 1867 में इन्हीं की प्रेरणा से आत्माराम पांडुरंग ने प्रार्थना समाज का गठन किया और दक्षिण भारत में वेद समाज की स्थापना हुई।।

1864 में मद्रास में स्थापित वेद समाज के संस्थापक के श्रीधरालू नायडू थे इसकी स्थापना की प्रेरणा भी केशव चंद्र सेन ने दी थी। इसे दक्षिण भारत का ब्रह्म समाज कहा जाता था। आचार्य केशव चंद्र सेन ने ब्रह्म समाज के आंदोलन को अखिल भारतीय रूप प्रदान किया। यह जान द बैप्टिस्टः ईसा मसीह और सेंट पाल के जीवन से बहुत प्रभावित थे आचार्य केशव चंद्र सेन अंतरजातीय विवाह स्त्री शिक्षा विधवा विवाह पर बल दिए बाल विवाह बहुविवाह जाति प्रथा की कटु आलोचना की यह बाल विवाह के कट्टर विरोधी थे। 

केशव चंद्र सेन जब से ब्रह्म समाज के आचार्य बने हुए थे ब्रह्म समाज में एक उदारवादी दृष्टिकोण आ गया था ईसाइयत और इस्लाम दोनों का प्रभाव उनके ऊपर था  जिसका परिणाम यह निकला कि ब्रह्म समाज में कहीं बाइबल पाठ तो कहीं कुरान पाठ होने लगे जिसकी वजह से देवेंद्र नाथ टैगोर और आचार्य केशव चंद्र सेन की विचारों में मतभेद हो गया। 1866 में पहली बार ब्रह्म समाज में फूट पड़ी और यह दो गुटों में बट गया। राजा राममोहन राय, द्वारिका नाथ टैगोर के पश्चात देवेंद्र नाथ टैगोर वाला गुट आदि ब्रह्म समाज कहलाया और आचार्य केशव चंद्र सेन का जो गुट था वह भारतीय ब्रह्म समाज या ब्रह्म समाज आफ इंडिया कहलाया जिसके सर्वे सर्वा आचार्य केशव चंद्र सेन थे । भारतीय ब्रह्म समाज के रूल रेगुलेशन नियम का निर्माण गुरु गोविंद राय ने संस्कृत में तैयार किया ।  भारतीय ब्रह्म सभा धार्मिक संकीर्णता से मुक्त थी इस सभा में हर धर्म के लोग हर जाति के लोग आकर के पाठ कर सकते थे।

 केशव चंद्र सेन 1870 में इंग्लैंड गये 6 माह तक प्रवास किया और 70 से अधिक व्याख्यान दिया। वहां से वापस आने के बाद 1870 में इन्होंने इंडियन रिफॉर्म एसोसिएशन की स्थापना की, सुलभ समाचार निकाला इंडियन मिरर अंग्रेजी अखबार निकाला तथा स्त्री पत्रिका वामा बोधिनी का प्रकाशन किया । भारत आश्रम तथा ब्रह्म निकेतन गठन किया । ब्रह्म विवाह अधिनियम को पारित कराया । बाल विवाह के घोर विरोधी आचार्य केशव चंद्र सेन ने अपने 13 वर्षीय बेटी सुनीति देवी का विवाह कूचबिहार के महाराजा से यह कहते हुए कर दिया कि यह ईश्वरी विधान है। जिसकी वजह से भारतीय ब्रह्म समाज में फूट पड़ गई 1878 में दो गुटों में बट गया। आनंद मोहन बोस व शिवनाथ शास्त्री के नेतृत्व में साधारण ब्रह्म समाज का गठन हुआ और आचार्य केशव चंद्र सेन का गुट नवीन ब्रह्म समाज कहलाया ।।

भारतीय ब्रह्म समाज के दो गुटों में बट जाने के कारण आचार्य केशव चंद्र सेन को बहुत ही धक्का लगा ।वह अकेले रहने लगे वह टूट से गए थे और अट्ठारह सौ चौरासी में अपनी मृत्यु से पहले या नव विधान साधना में लीन हो चुके थे 1884 में जब इनकी मृत्यु हुई तो संस्कृत का महान विदेशी विद्वान मैक्समूलर ने लिखा है कि भारत में अपना श्रेष्ठतम पुत्र खो दिया है। एक समाज सुधारक के रूप में आचार्य केशव चंद्र सेन हमेशा याद किए जाएंगे उन्होंने स्त्रियों की दशा को  सुधारने का जो कार्य किया है वह निश्चित रूप से भारतीय समाज के पुनर्जागरण में मील का पत्थर साबित हुआ है । इन्हीं की प्रेरणा से 1872 का ब्रह्म विवाह अधिनियम भी पारित हुआ था जिसे तृतीय नियम भी कहा जाता है।

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