सूदखोर
’अगर इस बार सूद का पैसा नही दी तो तुम्हारी बेटियों को उठा ले जाऊंगा’ इस धमकी को सुनकर करीमन का कलेजा दहल उठा था। किसी तरह इज्जत ढांपे दिन काट रही करीमन की आज सरेआम बेइज्जती हुई थी। अपने मरद के इलाज के लिए करीमन ने सूद पर उधार क्या लिया इज्जत पर उसके बन आई थी। मूल से ज्यादा चुकाने के बावजूद अभी देनदारी ज्यों की त्यों थी। आज सूदखोर के करींदे उसके घर पर चढ़ आये और धमकी भी इस कदर दिये कि इज्जत तार-तार हो गई। मुहल्ले का कोई भी उनका मुंह नही रोक पाया। मां, बहन की गालियां दिया सो अलग।
सात भाईयों का कुनबा था उस सूदखोर का सब एक से बढ़कर एक खुंखार थे, कोई उनसे टकराने की जुर्रत नही करता था। सूद पर पैसे बाटना उनका धंधा था। तीन प्रतिशत से लेकर दस प्रतिशत मासिक के दर से वो सूद बांटते और सूद के पैसे वसूलते थे। सरकारी बैंक जहां वार्षिक बारह से पंद्रह प्रतिशत की दर से सूद वसूलते हैं वहीं ये सूद का अवैध धंधा करने वालों का एक सौ बीस प्रतिशत वार्षिक होता था। करीमन का आदमी मुमताज जब सही था तो करघे पर काम करता था, वो साड़ी उतारता था कि पूछो मत। कई बार तो उसने करीमन को अपने हाथ से बुनी हुई साड़ी पहनाई थी भले उसकी महीने भर की मजदूरी साड़ी के भेंट चढ़ गई थी।
बेटे की चाह मे एक-एक करके मुमताज और करीमन से पांच बेटियां पैदा हो गई। करघे पर काम करते, बीड़ी फूंकते गृहस्थी की गाड़ी खींचते-खींचते टीवी ने उसे कब घेर लिया पता नही चल सका। कौवा खाने भर मास उसकी देह पर नही बचा था। बीमारी तोड़ती जा रही थी आठ बाई बारह के कमरे में कुल सात परानी रहते थेे। पांच बेटियां करीमन और मुमताज। गरीबी उनके घर गोड़ तोड़ कर बैठ गई। दुर्भाग्य ने घेर लिया अब तो करीमन के मजदूरी करने के दिन आ चुके थे। बेटियां सयानी हो चुकी थी, सो करीमन उन्हे किसी के घर काम करने जाने नही देना चाहती थी। इधर मुमताज दिन पर दिन मौत के करीब होता जा रहा था। करीमन से किसी ने बताया कि अगर शहर ले जाकर मुमताज का इलाज करा दो तो शायद वो ठीक हो जाय। इसी लालच में करीमन ने सूदखोर से दस हजार रूपये उधार ले लिये थे। दस हजार के एवज में सूद के रूप में एक हजार रूपये हर महीने वो जमा कर रही थी। सूद दर सूद के चक्कर में वो ऐसा फंसी कि दो साल हो चुका था लेकिन पचास हजार की देनदारी अब भी बनी हुई थी। सूद भरते-भरते तंग आ चुकी करीमन ने एक एक करके अपने सारे गहने बेच दिये अब बारी घर के बर्तनों की थी। डेट से एक दिन भी अधिक होता तो सूदखोर के आदमी आ जाते थे और दो चार सुना देते। उनका सुनाना करीमन सह भी लेती लेकिन उनकी आंखे बारी-बारी करीमन की बेटियों को ताड़ती रहती थी वो उससे बर्दाश्त नही होता था। वो चाह कर भी कुछ नही बोल पाती थी। सूख चुके ओठों से वो उनको ’भईया’, ’भईया’ कहती करीमन जानती थी कि लाख वो कोशिस कर ले लेकिन इन नामुरादों के आखों से हवस की भूख मिटा नही सकती थी। करीमन की कोशिस यही रहती थी कि सूदखोर उसके दरवाजे न आये चाहे जो बेचना पड़ जाय। कई माह से करीमन ने सूद नही दिया था। मुमताज को लेकर शहर जाते समय सूदखोरों ने उसे बीच सड़क पर पकड़ लिया कहा कि करीमन बीबी सूद का पैसा चुका नही पा रही हो तो अपना घर हमे लिख दो। करीमन अंदर से कांप गई, घर बेच देगी तो वह रहेगी कहां ? कहां लेकर जायेगी अपनी बेटियों को ? कल्पना करके करीमन का कलेजा दहल गया। मन ही मन वह सोची चाहे जो हो जाय लेकिन वो अपना घर नही बेचेगी। सूदखोर के आदमियों से मोहलत मांगें धीरे-धीरे आठ माह बीत गये लेकिन करीमन कोई जुगाड़ नही कर पायी। अब तो करीमन मुमताज को लेकर शहर जाना बंद कर दिया था, उसने सुन रखा था कि सूदखोर रास्ते से उठाकर कर कई कर्जदारों से जबरदस्ती उनके जमीन रजीस्ट्री करवा लिया था। अब जब सूदखोर के आदमी करीमन के घर आते तो करीमन की बेटियां दरवाजा अंदर से बंद कर लेती और अंदर से ही बोल देती कि ’ भाई जान, अम्मी नही हैं’। रिश्ता वो खास तौर से जोड़ती थी। आंख सेकने की गरज से करींदे दरवाजा खुलवाते रहते लेकिन करीमन के हिदायत के मुताबिक बेटियां दरवाजा नही खोलती, और खोलती भी कैसे ? पर्दा करने के लिये कुछ था भी नही उनके पास, झिलंगहवा समीज जिसके आर पार सबकुछ दिखता था और पैजामा जिसे वो पहनती थी उसे पहन कर अगर सामने आ जाय तो खुद से ही बेइज्जत हो जाय। सही तरीके से जिस्म ढकने तक की व्यवस्था नही थी। ऐसे में दरवाजा खोलने का सवाल ही कहां उठता था ? पोखरे के किनारे बकरियां चरा रही करीमन को किसी ने बताया कि सूदखोर के आदमी आज भी आये हैं, दरवाजे पर तुम्हारे और बड़े गुस्से में हैं, करीमन का कलेजा बैठने लगा था, वो बकरियां हाक कर धीरे-धीरे अपने घर की ओर बढ़ने लगी यह सोचते सोचते कि आज वो क्या बहाना बनायेगी? कैसे बचेगी उन जालिमो से ? न जाने वो क्या - क्या कर दें ? करीमन अपने घर के पास पहुंची तो देखती है कि एक मोटरसाइकिल पर तीन युवक थे जो देखने में जरा सा भी शरीफ नही मालूम पड़ रहे थे। हिम्मत करके करीमन आगे बढ़ी उन युवकों ने कहा करीमन रूपया कब तक चुकाओगी ? अरे भईया, कुछ दिन की मोहलत और दे दीजिये पूरा रूपया चुका दूंगी लगभग गिड़गिड़ाते हुये करीमन बोली। मूल से ज्यादा तो दे ही चुकी हूं थोड़ी रहम करिये, बहुत गरीब हूं मै लेकिन बेईमान नही हूं सब दे दूंगी। युवकों में से एक जिसका नाम संतोष था भनभनाते करीमन की मां बहन एक कर दिया कहा पहले कर्जा ले लेती हैं, जब चुकाने की बारी आती है तो नाटक करती हैं। पूरे मुहल्ले में सबके सामने मां की गाली सुन करीमन आवेश में आ गई। वो भी जोर से बोली कि मूल से ज्यादा सूद भर चुकी हूं कोई एहसान नही किये हैं आप लोग मां बहन की गाली मत दीजिये। करीमन का इतना बोलना उन युवकों को आग कर गया। तीनों एक साथ करीमन पर पिल पड़े बस गलीमत यही थी कि उन गुण्डों ने अभी हाथ नही उठाया था हां गालियां तो इतनी दी जितना करीमन अपने सात जन्मों में नही सुनती। तीन गुण्डों से आखिर करीमन कितना लड़ती वो चिल्ला रही थी लेकिन उसकी आवाज दब कर रह जा रही थी। शोर गुल से मुहल्ले की पूरी भीड़ जमा हो चुकी थी, तीनो दरवाजे पर अब भी खड़े थे। मुहल्ले में करीमन खुद को कमजोर साबित नही होने देना चाह रही थी। गरीबी मुहजोर बना भी देती है।
दरवाजा अंदर से अब भी बंद था, बेटियां चाह कर भी अपनी मां की ओर से नही लड़ पा रही थी। मुमताज तो बेसुध था, बीमारी ने उसे खटिये से चिपका दी थी। वो उठने की कोशिस करता तो जोर-जोर से आने वाली खांसी उसे बेदम कर देती। करीमन के न दबने की वजह से तीनों युवक का अपना खौफ कम होता दिखाई दे रहा था। एक ने दबदबा बढ़ाने की गरज से कमर में खोसा तमंचा निकाल लिया कहा करीमन बीबी! पैसा चुका दो या घर लिख दो अगर एक हफ्ते के अंदर नही कि तो तुम्हारी बेटियों को उठा ले जाऊंगा। धमकाते हुये तीनों युवक वहां से बाइक पर बैठकर चले गये। मुहल्ले की भीड़ खिसकने लगी थी। जिन मुहल्लेे वालों की निगाहों में अपनी इज्जत बचाने के लिए करीमन अब तक लड़ रही थी उन्ही के आगे बेईज्जत हो चुकी थी। सरेआम बेटियां उठा ले जाने की धमकी ने उसे बता दिया था कि वो कितनी कमजोर है। गुण्डों के जाने की आहट व करीमन के दस्तक से बेटियों ने दरवाजा खोला, करीमन की लानत मलानत मुमताज पर निकल रही थी। इसी ’हरामी’ की वजह से हमे यह दिन देखना पड़ रहा है। मुमताज क्या बोलता ? बीबी के मुुंह से निकली गालियों का उस पर कोई फर्क नही पड़ा। वो सोच रहा था कि सही तो कह रही है करीमन आखिर उनके दुर्भाग्य का कारण तो वही है। न बेटियां पढ़ लिख सकी, न हाथ पीले कर सका न दो जून की रोटी का इंतजाम कर सका। अगर गालियां देकर ही उसे संतोष मिलता हो तो मिल जाय। बुदबुदाती करीमन बेटियों से लेकर मुमताज और मुहल्ले वालों सबको कोस रही थी। उसको उसके दुर्भाग्य का सब जिम्मेदार लग रहे थे। कोई राह नही दिख रहा था उसे करे तो क्या करे ? दिन तो किसी तरह बीत गया लेकिन रात में आंखों से नीद गायब थी। कभी सोचती कि चोरी से घर बेचकर सबको लेकर भाग जाय तो कभी सोचती सब मर जाते तो अच्छा रहता। कभी बेटियों को लेकर सोचती कि काश किसी अच्छे घर में रिश्ता हो जाता तो भी बहुत सहारा मिल जाता। करींदों की धमकी सूदखोर की हैवानियत के विचारों मे विचरण करती करीमन को आखों ही आंखो में भोर हो गई। सुबह हुई करीमन बेटियों के साथ मुहल्ले के तिराहे पर लगे जलकल विभाग के नल से पानी भरने पहुंची। करीमन बाल्टी भर कर बेटियों को थमाती जाती बेटियां पानी पहुंचाती जाती। पानी भरने की ही गरज से मुहल्ले की नल के पास पहुंची हुश्नेआरा ने करीमन को धीरे से सलाह दिया कि काहे नही एक बार साबिर भाई से मिल लेती वो जरूर कोई रास्ता निकाल देंगें। साबिर का मुहल्ले में ठीक ठाक नाम था, उनके कई भाई सऊदी अरब में रहकर काम करते थे वहीं से रूपया भेजते थे। घर की माली हालत ठीक थी। साबिर भाई को बस घर के सम्पत्ति की देख रेख करनी पड़ती थी। घर में मियां, बीबी व एक बेटा तथा एक बेटी थे। ऐशो आराम की जिंदगी थी। उनकी बीबी सोगरा को दिल की बीमारी थी सो उससे घर का काम भी नही सपरता था। साबिर भाई अपना खर्च चलाने के लिए कुछ दायें बायें करने से गुरेज नही करते थे। एक दो बार तो उनका नाम रूपया लेकर नौकरी दिलाने के प्रकरण में भी आया था लेकिन कोतवाली में ठीक ठाक जान पहचान की वजह से बात दबी की दबी रह गई। बीबी की तबीयत ठीक नही रहती सो बीबी से वो कटे ही कटे ही रहते थे। करीमन उनके दरवाजे पर दस्तक दी। साबिर भाई अपने घर के दालान में बैठे थे। करीमन गेट खोलकर अंदर पहुंच गई और ओसारे में बैठ गई। साबिर भाई ने कहो करीमन कैसे आना हुआ ? सुना है कल कुछ लोग तुमकों गाली फक्कड़ दे रहे थे । क्या बात है ? बदले में करीमन ने सारी कहानी कह सुनाई, साबिर भाई ने अफसोस जाहिर करते हुये कहा अरे तुम मेरे मुहल्ले की ही हो कोई बात होती तो बताना ही न चाहिये थे। रूको अभी मैं बात करता हूं, इतना कह कर साबिर अपनी मोबाईल निकालने लगते हैं। करीमन उनके हक में दुआ पढ़ने लगती हैं। करीमन केवल साबिर का बोला सुन पा रही थी, साबिर बोल रहे थे कि ’चाहे जो इस तरह दरवाजे पर आकर गाली फक्कड़ नही देना चाहिये आखिर सबकी इज्जत है, कोई मसला है तो मिल बैठकर सुलझाया जा सकता है। आपके आदमियों का यह काम ठीक नही है’। करीमन का कलेजा मजबूत होता जा रहा था। मोबाइल रखते हुए साबिर भाई ने बताया कि अब से सूदखोर के आदमी तंग नही करेंगें लेकिन उनका पैसा तुमको चुकाना होगा। करीमन बोली मैं बेईमान नहीं हूं पूरा पैसा चुका दूंगी। मन ही मन करीमन यह भी सोच रही थी कि आखिर कैसे चुका दूंगी ? मजदूरी करके तो बड़ी मुश्किल से पेट भर पाता है। करीमन के चेहरे पर खिच आई चिंता की लकीरों को पढ़ते हुये साबिर भाई बोले मुमताज तो कोई काम -धाम करता नही फिर कैसे चुका दोगी ? इस अप्रत्याशित सवाल पर करीमन को कोई जवाब नही सूझा। सारी बकरियां और मुर्गियां और घर के पूरे सामान बेच भी दे तो भी तो देनदारी नही जुट पायेगी। घर में और कुछ है भी नही जिसे गिरवी रख कर कर्जा चुकाया जाय। उधेड़बून में में उलझी करीमन के मुंह से कुछ जवाब नही निकला। देखो करीमन मुझे तुमसे हमदर्दी है, मेरे यहां बहुत काम है, सोगरा से काम सपरता नही अगर मेरे घर कोई काम करने वाली मिल जाय तो उसे घर की तरह रखेंगें और महीने का खिला पिलाकर एक हजार दे भी देंगें। करीमन को लगा उसके लिये अल्लाह ताला ने फरिश्ता भेज दिया है। करीमन ने कहा कि मैं आपके घर का सारा काम कर दूंगी। साबिर भाई ने कहा कि अरे तुम जो करती हो करती रही हो अपनी बड़ी बेटी जाहिदा को भेज दिया करो, दोनो मिल कर कमाओगी तो जल्दी कर्जा पाट दोगी, आखिर घर बैठे रहने से कोई फायदा तो है नही। करीमन बोली सोचती तो हूं जमाना जुग देखकर बेटियों को कहीं जाने देने का मन नही होता। साबिर भाई ने कहा कि अरे लड़कियां बड़े-बड़े काम कर रही है और फिर जाहिदा को जाना कहां है ? मेरे घर ही तो आना है, और मेरा घर तो तुम्हारा ही घर है, है कि नही। एक मुस्कान के साथ साबिर भाई बोले, करीमन ना नही कर सकी। साबिर भाई से इजाजत लेकर करीमन अपने घर आई आज उसका जी थोड़ा हल्का हो आया था। एक उम्मीद की किरण ने उसे हौसलों से भर दिया था। उसने पूरी बात अपनी बेटियों से बताई, जाहिदा अपनी मां को अचरज से देख रही थी । करीमन उसे समझा रही थी कि कायदे से सारे काम करना किसी बात का जवाब न देना साबिर भाई अच्छे आदमी हैं। अगले दिन जाहिदा को साबिर भाई का घर दिखा, करीमन अपनी बकरियां लेकर चली गई। जाहिदा साबिर भाई के घर पहुंची बरामदें में बैठे साबिर भाई को उसने बड़े अदब से ’अस्सलाम वालेकुम’ कहा बदले में साबिर ने भी कहा सलाम वालेकुम और जाहिदा को अंदर जाने का ईशारा कर दिया। जाहिदा अंदर गई साबिर की पत्नी से मिलकर उसने सारा काम समझ लिया। पूरा मन लगाकर उसने काम किया। खाना बनाना छोड़कर घर का वो सारा काम करती। साबिर के कमरे की सफाई करने से लेकर बर्तन मांजना हो या कपड़ा धोना हर काम । साबिर के घर के जैसी हो गई थी। साबिर भाई के घर का लजीज खाना खाकर एक ही महीने में जाहिदा निखर गई थी। पेट भरा हो तो चेहरे पर एक मादक मुस्कान आ ही जाती है। पहली पगार का जब हजार रूपया साबिर ने उसे दिया तो जाहिदा का हाथ उसने दबा दिया था। जाहिदा पहली पगार पाने की खुशी में हाथ दबाने पर गौर नही किया। घर आकर उसने वो एक हजार रूपये करीमन के हाथ पर रख दिये। करीमन खुश थी थोड़ी सी ही सही अमीरी के एहसास ने उसे अंदर से थोड़ा दिलासा दे गई। दस महीने काम करेगी जाहिदा तो दस हजार जुट जायेंगें रूपये सहेज कर रखते हुए उसने मन ही मन सोचा। करीमन के कमाई से घर का खर्चा चलता, और जाहिदा की कमाई सूद की रकम चुकाने के लिए सहेजी जाने लगी। धीरे-धीरे तीन माह बीत गये। अब जाहिदा को यह एहसास होने लगा था कि साबिर भाई गाहे बगाहे उसे छूने की कोशिस करते रहते हैं, कभी तहमद पकड़ाती तो पूरा हाथ पर सहलाते हुये तहमद लेते। गिलास का पानी देती तो उंगलियों को छूने से वो परहेज नही करते। उम्र दराज होने के नाते जाहिदा साबिर की मंशा भाप तो नही पाती लेकिन उसे यह लगता था कि साबिर की नियत ठीक नही है। जाहिदा सोचती अगर वो इस बारे में करीमन को बतायेगी तो जो हजार रूपये मिलते हैं वो तो जायेगें ही, भर पेट भोजन भी छिन जायेगा फिर सूदखोरों से निपटने का हौसला किसके पास है, साबिर भाई की ही वजह से वो हरामखोर दरवाजे तक तो नही आते। फिर अगर साबिर भाई का घर छूट गया तो टीवी कहां देखेगी ? सब सोचकर जाहिदा साबिर की हरकतों का विरोध नही करती। साबिर की बीबी सोगरा की रिश्तेदारी में शादी पड़ी थी, सोगरा जाने वाली थी। साबिर ने अपने बेटे, बेटी और सोगरा को यह कहते हुये भेज दिया कि वह शादी वाले दिन आयेगा। एक हफ्ते पहले से वो जाकर क्या करेगा ? फिर पूरे घर में ताला मारकर सात दिनों के लिये जाना भी तो ठीक नही। जाहिदा सुबह शाम का खाना बना देगी, झाड़ू पोछा कर ही देगी, काम चल जायेगा। पूरे परिवार को इत्मीनान हो गया कि साबिर सही कह रहे हैं। तयसुदा समय पर साबिर का परिवार रिश्तेदारी के लिए रवाना हो गया। जाते -जाते सोगरा करीमन से कह गई थी कि जाहिदा को थोड़ी देर हो जाया करेगी। रोज की तरह जाहिदा उस दिन भी काम पर आई। झाड़ू, पोछा, बर्तन करने के बाद साबिर से उसने पूछा साहब खाना क्या बनेगा ? साबिर ने कहा कि गोश्त पका लेती हो तो पका लो, हां दो आदमी भर का पकाना। जाहिदा ने आराम से गोश्त पकाया, साबिर ने छक कर खाया और आराम करने लगा। उसने जाहिदा से कहा कि तुम भी खा लो। जाहिदा ने उस दिन बिना किसी संकोच के जी भर के खाना खाया। साबिर ने कहा कि जाहिदा थोड़ा आराम कर लो, फिर बर्तन साफ कर घर चली जाना। जाहिदा टीवी वाले कमरे में बैठकर टीवी देखने लगी। एक तो गोश्त की गर्मी उपर से भरा पेट थोड़ी ही देर में उसे नीद आने लगी। वो उसी कमरे में बिस्तर पर लेटी तो उसे नीद आ गई। जब उसकी आंख खुली तो देखी कि साबिर उसके उपर झुका हुआ था। उसके हाथ जाहिदा की जांघ पर थे। जाहिदा का पूरा जिस्म थरथरा उठा वो चाहती तो जोर से धक्का मार कर साबिर को गिरा देती, लेकिन धक्का मारने के बजाय उसने कहा ये ठीक नही है मालिक मुझे जाने दीजीये। साबिर की उम्र पचास पार कर चुकी थी लेकिन बदन गठीला था कहां अभी बमुश्किल से 23 साल की जाहिदा । दोनो हाथों को दबाते हुये साबिर बोला अरे कुछ नही होगा बस मुझे थोड़ा सा खुश कर दो फिर चली जाना, यकीन मानो कोई जानेगा नही, लगभग मिन्नत करते हुये साबिर बोला। जाहिदा उसकी पकड़ से निकलने के लिये मचलने लगी थी लेकिन कामयाब नही हो पा रही थी। साबिर अपनी रौ में बोलते जा रहा था, तुम मुझे खुश कर दो मैं तुम्हे खुश कर दूंगा। तुम्हारा सारा कर्जा भी पाट दूंगा। नये कपड़े दिलवा दिया करूंगा, बस एक बार खुश कर दो। जाहिदा का प्रतिरोध जारी रहा, साबिर ने कहा तुम्हारे अब्बू का इलाज भी करा दूंगा जाहिदा मुझे अपनी वाली कर लेने दो। ’नही’, नही का रट लगाये जाहिदा पूर जोर विरोध नही कर रही थी, औरत अपने पर उतर आये तो क्या एक अकेला पुरूष अपनी मनमानी कर सकता है, शायद नही। अपने जिस्म को जाहिदा के जिस्म के उपर डालकर साबिर तेजी से अपने हाथ चला रहा था। कामातुर पुरूष हर जतन करता है वही हालत साबिर की थी। जाहिदा उसका सहयोग नही कर रही थी लेकिन पुरजोर विरोध नही कर पा रही थी वह कह तो रही थी कि मुझे छोड़ दीजीये नही तो चिल्ला दूंगी लेकिन उसकी यह धमकी दबी जबान में ही थी। साबिर पर वासना का भूत सवार हो चुका था, जाहिदा के शोर मचाने की धमकी और खुद की फेल होती कोशिस ने उसे गुस्से भर दिया।
उसने आखिरी दाव चला कि ठीक है शोर मत मचाओ मैं छोड़ दूंगा लेकिन उसके बाद का हश्र जान लो। कोई तुम्हे काम पर नही रखेगा, सूदखोर आकर मां बहन की गालियां देगें , तुम्हार घर भी बिक जायेगा, अब्बू का इलाज भी नही होगा और तुम्हारी बहनो के हाथ नही पीले होगें आज नही तो कल उनकी इज्जत किसी न किसी के हाथो निलाम हो जायेगी। जाहिदा के आंखो के आगे सारा दृश्य एक बार में घूम गया। जाहिदा का प्रतिरोध ढीला पड़ने लगा था, साबिर हावी होता जा रहा था जैसे वो अपने मूल का सूद वसूल रहा हो। जिस इज्जत को बचाने के लिए करीमन जूझती रही लड़ती रही वो आज साबिर के पैरों के पास पड़ी थी। काम निपटाने के बाद अपनी तहमद लपेटता हुआ साबिर बोला बर्तन माज के जाना और सुनो किसी से कहोगी तो बेइज्जती तुम्हारी होगी मेरी बन के रहोगी तो ऐश करोगी। रौंदे जाने का एहसास जाहिदा को अंदर से साल रहा था। जिस इज्जत के लिए उसकी मां लड़ती रही वो रौंदी जा चुकी थी। जाहिदा के आंखों के आगे कभी मां तो कभी बहन कभी अब्बु का चेहरा नाच रहा था। वो दर्द से भरी थी उस दर्द को साबिर कहे शब्द कम नही कर पा रहे थे। कभी वो साबिर के कहे शब्दों पर विस्वास करती तो इज्जत के जाने का गम नही होता अगले ही पल साबिर ने जिस शातिर तरीके से उसे जाल में फंसाकर अपनी हवस का शिकार बनाया उसे याद करती तो वो बेचैन हो जाती। वो सोच-सोच कर परेशान थी कि अगर साबिर बदल गया तो क्या होगा ? क्या उसका घर बच पायेगा, क्या उसके अब्बू का इलाज होगा क्या उसकी बहनों के हाथ पीले होंगें इन्ही उलझनों में उलझी जाहिदा के कदम धीरे-धीरे घर की ओर बढ़ चले थे।




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