काशी
तीन लोक से न्यारी काशी को कौन नही जानता ? परंतु मैं जिस काशी की बात कर रहा हूं वो भगवान शंकर के किसी भूत से कम नही थे। मुझे जो याद आ रहा है कि काशी गौरी नारायणपुर के ऐसे प्रसिद्ध व्यक्ति थे जिन्हे ढूढों तो वो कहीं न कहीं मिल ही जाते थे। एक झोली, एक बांस की कईन, धोती कुर्ता उपर से वर्षों की धोई हुई सदरी, कभी मौज में होते तो पगड़ी भी बांध लेते थे। इलाके के कुत्ते काशी से खौप खाते थे। क्या पता काशी जी किस कुत्ते की पूंछ पकड़ चार चक्कर घुमाकर पटक दें या किसी पिल्ले का कान ही जोर से उमेंठ दे कूं कूं करता वो अपनी जान की दुहाई मांगता भाग निकले।
किसी भी मुसीबत या समस्या जो किसी सामान्य आदमी से हल नही होती उसका निदान काशी के पास होता था। एक बार गौरी नारायणपुर के एक पंडित जी के यहां अजीब सी मुसीबत आ गई। पंडिताईन लोटे में दूध रखकर रसोई का दरवाजा बंद कर दी और अपना काम करने में व्यस्त हो गई। इसी बीच न जाने कहां से एक बिल्ली रसोई में घुस गई और दूध की लालच में अपना सिर लोटे में डाल दी। दूध तो बिल्ली पी गई लेकिन उसकी गर्दन लोटे में फस गई। गर्दन फंसते ही बिल्ली व्याकुल हो गई। लगी उछलने कूदने, लोटे से गर्दन निकालने के चक्कर में पूरे रसोई घर का उसने सत्यानाश कर डाला। जब रसोई से बर्तन गिरने की आवाज आई तो पंडिताईन डर गई । डरी सहमी पंडिताईन बड़ी हिम्मत करके दरवाजा खोला तो देखा की एक बिल्ली की गर्दन लोटे में फसी है और वो पूरी तरह से परेशान है। घंटो हो गया लेकिन किसी को कोई उपाय नही सूझ रहा था। उधर लोटे में दो घंटे से फसी बिल्ली हिंसक हो चुकी थी। अगर कोई हिम्मत करके बिल्ली को पकड़ने के लिए छूता बिल्ली छटक के भाग जाती थी। पंडित जी भी आ गये उन्हे बिल्ली के मर जाने का डर सताने लगा। पंडित सोचने लगे कि अगर कहीं यह बिल्ली मर गई तो सोने की बिल्ली बनवाकर कौन दान देगा ? पंडित जी को कोई उपाय नहीं सूझ रहा था तभी कहीं से अपनी मौज में रमते झमते काशी आ गये। सारा वृतांत लोगों ने काशी को कह सुनाया। काशी ने कहा जरा देखने दो। काशी पल भर में सारा माजरा समझ गये। काशी घात लगाकर चुपके चुपके गये बिल्ली को छूने के बजाय उन्होने लोटे को कसकर पकड़ लिया। बिल्ली लगी जोर लगाने एक झटके में उसकी गर्दन लोटे से बाहर निकल गई, बिल्ली दुम दबाकर जोर से भागी । पंडित और पंडिताईन ने गहरी सांस ली। काशी में न जाने ऐसा क्या था कि दो चार कुत्ते उनके आगे पीछे मडराते ही रहते थे। कुछ लोग कहते हैं कि काशी कुछ भी खाते तो कुत्तों को देना नही भूलते थे शायद यही कारण था कि कुत्ते उनके आगे पीछे कुछ पाने की लालच में लगे रहते थे। तब रामलीला का बड़ा क्रेज था गौरी नारायणपुर के लडकों की टोली पड़ोस के अजमतगढ़ कस्बे में रामलीला देखने जाती थी। वहां की रामलीला बड़ी मशहूर थी। काशी भी उन्ही के साथ जाते थे। गौरी नारायणपुर से अजमतगढ़ जाने के रास्ते में एक कब्रिस्तान पड़ता था। तब भूत, प्रेत, शैतान, जिन्न, चुड़ैल की कहानियां आम थी। लोग घरों से बाहर दुआर पर सोना पसंद करते थे। कहीं न कहीं किसी न किसी कोने से यह अफवाह जरूर सुनने को मिल जाती थी कि बंसवार की चुरईन कटोरा हाथ में लेकर फलाने बाबा से कह रही थी कि ’ए बाबा बुकवा लगवा ला’। ऐसी न जाने कितनी बातें लड़कों के बीच चर्चा का विषय होती थी। रामलीला देर शाम को प्रारंभ होती थी रात को एक -दो बजे के बाद ही समाप्त होती थी। सांझ ढले खा पीकर लड़के अपनी-अपनी बोरी लेकर रामलीला देखने के लिए निकल पड़ते थे। तब बाजार में भी कम दुकाने थे। शाम को सात बजे ही चारो ओर सन्नाटा बिखर जाता था। अजमतगढ़ जाते समय भूत प्रेत के बातों के प्रभाव की वजह से लड़कों की निगाह बरबस कब्रिस्तान की ओर उठ जाती थी। काशी इस बात को ताड़ गये। काशी की दिमाग में खुरापात सूझी। एक दिन रामलीला देखने जाते समय जैसे लड़को की टोली कब्रिस्तान के पास से गुजरी काशी ने कहा कि इस कब्रिस्तान में कोई भूत है जो अपनी एक टांग उठाकर सोता है। काशी ने अपनी बात इस अंदाज में कही कि लड़को के मन में भय तो हो गया लेकिन जाहिर किसी ने नही किया सब हंसी में टाल गये। सब आराम से गये रामलीला देखे, काशी भी उन्ही के साथ रामलीला देखते रहे। मौका पाकर काशी रामलीला समाप्त होने के थोड़ी देर पहले वहां से निकल लिये। रात को एक बजे रामलीला समाप्त हुई। लड़के घरों को लौटने लगे। जैसे अजमतगढ़ की सीमा लड़कों ने पार की काशी की कही एक-एक बात उन्हे याद आने लगी, लेकिन हिम्मत करके लड़के आगे बढ़ते रहे। कोई मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ रहा था तो कोई अपनी जनेऊ पकड़ रखा था। कोई बजरंग बाण जाप रहा था, किसी को कुछ नही आता तो वह जय हनुमान जी, जय हनुमान जी चापे जा रहा था। वो पल भी आ गया जब कब्रिस्तान भी नजदीक आ गया। लड़कों की धकधकी बढ़ चुकी थी। उधर काशी जो रामलीला बीच में ही छोड़कर लड़कों से पहले ही आ चुके थे। एक कब्र के उपर लेट गये थे, जैसे ही उन्हे आहट लगी कि लडकों की टोली आ रही है, काशी ने अपना एक पांव उपर कर दिया। इधर लड़के जो पहले ही कहानियां सुनकर भयभीत थे वे जब कब्रिस्तान के पास पहुंचे तो उनकी निगाह बरबस कब्रिस्तान की ओर मुड़ गई। एक दो लड़कों ने तो कब्रिस्तान की ओर देखा ही नही जिन लड़को ने हिम्मत करके कब्रिस्तान की ओर देखे तो कब्र पर एक टांग उठाकर लेटे किसी व्यक्ति को देखे तो इतना जोर से चिल्लाकर भागे कि उन्होने पलट कर देखना भी मुनासिब नही समझा कि उनके पीछे कौन आ रहा है कौन नही, लड़कों का चिल्लाना था कि जो जिधर भागा वो उधर। कोई लड़का अपने घर से पहले नही रूका। चिल्लाते और भागते लड़को के झुण्ड ने सबको किसी अनहोनी की आशंका से भर दिया। घर वालों ने अपने लड़कों को देखा तो वो पसीने से तरबतर हो हांफ रहे थे। आंखे आश्चर्य से फैली हुई थी, सबकी आंखों के आगे कब्रिस्तान में एक टांग उठाकर लेटा हुआ भूत दिखाई दे रहा था। कुछ को भूत के भय की वजह से बुखार आ गया। लाल मर्चा, लोहबान सुलगाने से भी जब फायदा नही हुआ तो काशी ने घूम-घूमकर सबको असलियत बताई तब जाकर बच्चों तबीयत ठीक हुई। इसी तरह नगर के कोहार जाति एक व्यक्ति थे, बड़े पहलवान बनते थे। रोज कोई न कोई कहानी गढ़ के सुनाते थे आज इस बाग में शैतान से लड़ा आज उस बाग में, डिंगे हांकने में वो मशहूर हो चुके थे। काशी के कानों तक उनकी बहादुरी के चर्चे पहुंच गये। काशी उनके घर के आस पास मडराने लगे। पहलवान के घर से कुछ दूरी पर पीपल का एक बड़ा पेड़ था, उस पीपल के पेड़ को लेकर यह कहानी सुनाई जाती थी कि कोई चुड़ैल पीपल के पेड़ से निकल कर रोज रात को बंसवार में जाकर गायब हो जाती है। पीपल का पेड़ बहुत विशाल था, अंधेरी रात में जब भी हवा चलती तो उसके पत्तों का शोर भयानक डर उत्पन्न करता था। काशी ने इतना पता लगा लिया कि पहलवान रात को 9 बजे के बाद खाना खाकर बाहर पेशाब करने निकलते हैं। जब पेशाब करते हैं तो बैठे-बैठे पीपल के पेड़ के ओर जरूर देखते हैं। काशी के मन में शैतानी सूझ चुकी थी, अब वो पीछे हटने वाले नही थे। उन्होने एक कुम्हार के यहां से एक कोहा खरीदा। कोहा एक ऐसा मिट्टी का पात्र होता है जिसकी पेंदी चौड़ी होती है, मुंह बड़ा होता है लेकिन ऊचाई कम होती है। उस दिन की रात अंधेरी थी, तब अमूमन रात के नौ बजे तक सब लोग अपने घरों में कैद हो जाते थे। पहलवान रोजमर्रा की तरह उस दिन खाना खाये, और बाहर निकल कर पेशाब करने के लिए बैठ गये। आदत के मुताबिक उन्होने हहराते हुए पीपल की ओर मुंह किया तो देखते क्या हैं कि हवा में एक आग उड़ता हुआ उनकी ओर आ रहा है, जो जल रहा था बुझ रहा था। जैसे कोई शैतान अपने मुंह से रह-रहकर आग निकाल रहा हो। पहलवान की चीख निकल गई, धोती खराब हो गई, डर के मारे वो गड़गड़ कांपने लगे। भाग कर वो अपने ओसारे में पहुंचे और चिल्लाने लगे शैतान, शैतान। शैतान गायब हो चुका था। इस घटना के बाद पहलवान ने खाट पकड़ ली। जब उनकी बीमारी ठीक नही हुई तो काशी उनके पास पहुंचे कहे पहलवान चाचा अरे शैतान नही था वो मैं ही था। फिर काशी ने बताया कि उन्होने पगड़ी बांध कर कोहे को सिर पर रख लिया था उसमें एक मोमबत्ती जला दिया था तथा एक दफ्ती के टुकड़े से कोहे को ढकता फिर हटा देता यह करते हुये धीरे-धीरे चल रहा था। अंधेरी रात होने की वजह से मैं नही दिखाई दिया लेकिन आग जलती बुझती दिख रही थी और ऐसा लग रहा था कि कोई अदृश्य शैतान मुंह से आग निकाल रहा हो। पहलवान चाचा नही माने, काशी ने उनका डर दूर करने के लिए वही प्रयोग करके दिखाया। लाख के बावजूद वो पहलवान चाचा की हुड़ुक दूर नही कर पाये। शायद ही फिर किसी ने पहलवान चाचा को बहसते सुना होगा। अगर आप को गौरी नारायणपुर में कशी कही घूमते नजर आ जाए तो उन्हें लाल सलाम कहना मत भूलियेगा ( प्रदीप तिवारी )
किसी भी मुसीबत या समस्या जो किसी सामान्य आदमी से हल नही होती उसका निदान काशी के पास होता था। एक बार गौरी नारायणपुर के एक पंडित जी के यहां अजीब सी मुसीबत आ गई। पंडिताईन लोटे में दूध रखकर रसोई का दरवाजा बंद कर दी और अपना काम करने में व्यस्त हो गई। इसी बीच न जाने कहां से एक बिल्ली रसोई में घुस गई और दूध की लालच में अपना सिर लोटे में डाल दी। दूध तो बिल्ली पी गई लेकिन उसकी गर्दन लोटे में फस गई। गर्दन फंसते ही बिल्ली व्याकुल हो गई। लगी उछलने कूदने, लोटे से गर्दन निकालने के चक्कर में पूरे रसोई घर का उसने सत्यानाश कर डाला। जब रसोई से बर्तन गिरने की आवाज आई तो पंडिताईन डर गई । डरी सहमी पंडिताईन बड़ी हिम्मत करके दरवाजा खोला तो देखा की एक बिल्ली की गर्दन लोटे में फसी है और वो पूरी तरह से परेशान है। घंटो हो गया लेकिन किसी को कोई उपाय नही सूझ रहा था। उधर लोटे में दो घंटे से फसी बिल्ली हिंसक हो चुकी थी। अगर कोई हिम्मत करके बिल्ली को पकड़ने के लिए छूता बिल्ली छटक के भाग जाती थी। पंडित जी भी आ गये उन्हे बिल्ली के मर जाने का डर सताने लगा। पंडित सोचने लगे कि अगर कहीं यह बिल्ली मर गई तो सोने की बिल्ली बनवाकर कौन दान देगा ? पंडित जी को कोई उपाय नहीं सूझ रहा था तभी कहीं से अपनी मौज में रमते झमते काशी आ गये। सारा वृतांत लोगों ने काशी को कह सुनाया। काशी ने कहा जरा देखने दो। काशी पल भर में सारा माजरा समझ गये। काशी घात लगाकर चुपके चुपके गये बिल्ली को छूने के बजाय उन्होने लोटे को कसकर पकड़ लिया। बिल्ली लगी जोर लगाने एक झटके में उसकी गर्दन लोटे से बाहर निकल गई, बिल्ली दुम दबाकर जोर से भागी । पंडित और पंडिताईन ने गहरी सांस ली। काशी में न जाने ऐसा क्या था कि दो चार कुत्ते उनके आगे पीछे मडराते ही रहते थे। कुछ लोग कहते हैं कि काशी कुछ भी खाते तो कुत्तों को देना नही भूलते थे शायद यही कारण था कि कुत्ते उनके आगे पीछे कुछ पाने की लालच में लगे रहते थे। तब रामलीला का बड़ा क्रेज था गौरी नारायणपुर के लडकों की टोली पड़ोस के अजमतगढ़ कस्बे में रामलीला देखने जाती थी। वहां की रामलीला बड़ी मशहूर थी। काशी भी उन्ही के साथ जाते थे। गौरी नारायणपुर से अजमतगढ़ जाने के रास्ते में एक कब्रिस्तान पड़ता था। तब भूत, प्रेत, शैतान, जिन्न, चुड़ैल की कहानियां आम थी। लोग घरों से बाहर दुआर पर सोना पसंद करते थे। कहीं न कहीं किसी न किसी कोने से यह अफवाह जरूर सुनने को मिल जाती थी कि बंसवार की चुरईन कटोरा हाथ में लेकर फलाने बाबा से कह रही थी कि ’ए बाबा बुकवा लगवा ला’। ऐसी न जाने कितनी बातें लड़कों के बीच चर्चा का विषय होती थी। रामलीला देर शाम को प्रारंभ होती थी रात को एक -दो बजे के बाद ही समाप्त होती थी। सांझ ढले खा पीकर लड़के अपनी-अपनी बोरी लेकर रामलीला देखने के लिए निकल पड़ते थे। तब बाजार में भी कम दुकाने थे। शाम को सात बजे ही चारो ओर सन्नाटा बिखर जाता था। अजमतगढ़ जाते समय भूत प्रेत के बातों के प्रभाव की वजह से लड़कों की निगाह बरबस कब्रिस्तान की ओर उठ जाती थी। काशी इस बात को ताड़ गये। काशी की दिमाग में खुरापात सूझी। एक दिन रामलीला देखने जाते समय जैसे लड़को की टोली कब्रिस्तान के पास से गुजरी काशी ने कहा कि इस कब्रिस्तान में कोई भूत है जो अपनी एक टांग उठाकर सोता है। काशी ने अपनी बात इस अंदाज में कही कि लड़को के मन में भय तो हो गया लेकिन जाहिर किसी ने नही किया सब हंसी में टाल गये। सब आराम से गये रामलीला देखे, काशी भी उन्ही के साथ रामलीला देखते रहे। मौका पाकर काशी रामलीला समाप्त होने के थोड़ी देर पहले वहां से निकल लिये। रात को एक बजे रामलीला समाप्त हुई। लड़के घरों को लौटने लगे। जैसे अजमतगढ़ की सीमा लड़कों ने पार की काशी की कही एक-एक बात उन्हे याद आने लगी, लेकिन हिम्मत करके लड़के आगे बढ़ते रहे। कोई मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ रहा था तो कोई अपनी जनेऊ पकड़ रखा था। कोई बजरंग बाण जाप रहा था, किसी को कुछ नही आता तो वह जय हनुमान जी, जय हनुमान जी चापे जा रहा था। वो पल भी आ गया जब कब्रिस्तान भी नजदीक आ गया। लड़कों की धकधकी बढ़ चुकी थी। उधर काशी जो रामलीला बीच में ही छोड़कर लड़कों से पहले ही आ चुके थे। एक कब्र के उपर लेट गये थे, जैसे ही उन्हे आहट लगी कि लडकों की टोली आ रही है, काशी ने अपना एक पांव उपर कर दिया। इधर लड़के जो पहले ही कहानियां सुनकर भयभीत थे वे जब कब्रिस्तान के पास पहुंचे तो उनकी निगाह बरबस कब्रिस्तान की ओर मुड़ गई। एक दो लड़कों ने तो कब्रिस्तान की ओर देखा ही नही जिन लड़को ने हिम्मत करके कब्रिस्तान की ओर देखे तो कब्र पर एक टांग उठाकर लेटे किसी व्यक्ति को देखे तो इतना जोर से चिल्लाकर भागे कि उन्होने पलट कर देखना भी मुनासिब नही समझा कि उनके पीछे कौन आ रहा है कौन नही, लड़कों का चिल्लाना था कि जो जिधर भागा वो उधर। कोई लड़का अपने घर से पहले नही रूका। चिल्लाते और भागते लड़को के झुण्ड ने सबको किसी अनहोनी की आशंका से भर दिया। घर वालों ने अपने लड़कों को देखा तो वो पसीने से तरबतर हो हांफ रहे थे। आंखे आश्चर्य से फैली हुई थी, सबकी आंखों के आगे कब्रिस्तान में एक टांग उठाकर लेटा हुआ भूत दिखाई दे रहा था। कुछ को भूत के भय की वजह से बुखार आ गया। लाल मर्चा, लोहबान सुलगाने से भी जब फायदा नही हुआ तो काशी ने घूम-घूमकर सबको असलियत बताई तब जाकर बच्चों तबीयत ठीक हुई। इसी तरह नगर के कोहार जाति एक व्यक्ति थे, बड़े पहलवान बनते थे। रोज कोई न कोई कहानी गढ़ के सुनाते थे आज इस बाग में शैतान से लड़ा आज उस बाग में, डिंगे हांकने में वो मशहूर हो चुके थे। काशी के कानों तक उनकी बहादुरी के चर्चे पहुंच गये। काशी उनके घर के आस पास मडराने लगे। पहलवान के घर से कुछ दूरी पर पीपल का एक बड़ा पेड़ था, उस पीपल के पेड़ को लेकर यह कहानी सुनाई जाती थी कि कोई चुड़ैल पीपल के पेड़ से निकल कर रोज रात को बंसवार में जाकर गायब हो जाती है। पीपल का पेड़ बहुत विशाल था, अंधेरी रात में जब भी हवा चलती तो उसके पत्तों का शोर भयानक डर उत्पन्न करता था। काशी ने इतना पता लगा लिया कि पहलवान रात को 9 बजे के बाद खाना खाकर बाहर पेशाब करने निकलते हैं। जब पेशाब करते हैं तो बैठे-बैठे पीपल के पेड़ के ओर जरूर देखते हैं। काशी के मन में शैतानी सूझ चुकी थी, अब वो पीछे हटने वाले नही थे। उन्होने एक कुम्हार के यहां से एक कोहा खरीदा। कोहा एक ऐसा मिट्टी का पात्र होता है जिसकी पेंदी चौड़ी होती है, मुंह बड़ा होता है लेकिन ऊचाई कम होती है। उस दिन की रात अंधेरी थी, तब अमूमन रात के नौ बजे तक सब लोग अपने घरों में कैद हो जाते थे। पहलवान रोजमर्रा की तरह उस दिन खाना खाये, और बाहर निकल कर पेशाब करने के लिए बैठ गये। आदत के मुताबिक उन्होने हहराते हुए पीपल की ओर मुंह किया तो देखते क्या हैं कि हवा में एक आग उड़ता हुआ उनकी ओर आ रहा है, जो जल रहा था बुझ रहा था। जैसे कोई शैतान अपने मुंह से रह-रहकर आग निकाल रहा हो। पहलवान की चीख निकल गई, धोती खराब हो गई, डर के मारे वो गड़गड़ कांपने लगे। भाग कर वो अपने ओसारे में पहुंचे और चिल्लाने लगे शैतान, शैतान। शैतान गायब हो चुका था। इस घटना के बाद पहलवान ने खाट पकड़ ली। जब उनकी बीमारी ठीक नही हुई तो काशी उनके पास पहुंचे कहे पहलवान चाचा अरे शैतान नही था वो मैं ही था। फिर काशी ने बताया कि उन्होने पगड़ी बांध कर कोहे को सिर पर रख लिया था उसमें एक मोमबत्ती जला दिया था तथा एक दफ्ती के टुकड़े से कोहे को ढकता फिर हटा देता यह करते हुये धीरे-धीरे चल रहा था। अंधेरी रात होने की वजह से मैं नही दिखाई दिया लेकिन आग जलती बुझती दिख रही थी और ऐसा लग रहा था कि कोई अदृश्य शैतान मुंह से आग निकाल रहा हो। पहलवान चाचा नही माने, काशी ने उनका डर दूर करने के लिए वही प्रयोग करके दिखाया। लाख के बावजूद वो पहलवान चाचा की हुड़ुक दूर नही कर पाये। शायद ही फिर किसी ने पहलवान चाचा को बहसते सुना होगा। अगर आप को गौरी नारायणपुर में कशी कही घूमते नजर आ जाए तो उन्हें लाल सलाम कहना मत भूलियेगा ( प्रदीप तिवारी )


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