आतंक के गढ़ की तस्वीरें और भी हैं


- पूर्वांचल का सबसे बड़ा जिला आजमगढ़ जिसे आतंक का गढ़ भी कह देते हैं वैसे यह नाम अब जनपद के लिए नया नही रह गया है। इस नाम के साथ जीने और इस नाम के बाप दादाओं से लड़ने की आदत जो इसकी हो गयी है। आजमगढ़ के साथ यह नाम आखिर जुड़ कैसे गया ? इस जनपद की आबो हवा साहित्यिक से आपराधिक कैसे हो गयी ? आखिर क्यों अब राहुल सांकृत्यायन, कैफी आजमी के नाम की जगह अब अबु सलेम और आतंक के रास्ते पर चलने वाले कुछ भटके नौजवानों के नाम से आजमगढ़ को जाना जाता है ? इन बातों पर विचार करें मन को बहुत तकलीफ होती है, बस यही समझ में आता है कि बुराई से अधिक बुराई की चर्चा की गति तेज होती है
जनपद प्राचीन वैदिक काल से ही अपने अस्तित्व को बनाये रखा है। तमसा, सरयू और बेसो नदी की धारा ने बौद्ध धर्म को खूब पोसा। कौशल और काशी दोनो राज्यों के अंग रहे इस जनपद का जिक्र आइने अकबरी में मिलता है। देवल, दुर्वासा और दत्तात्रेय की इस धरती पर कभी अध्यात्म की त्रिवेणी बहती थी। कहा जाता है कि जौनपुर राज्य के अंतर्गत आने वाले खटवा गांव के गौतम वंशीय रियासतदार चंद्रसेन सिंह गौतम के दो पुत्र थे सागर सिंह और अभिमान सिंह। इन दोनो भाईयों में एक किसी पोखरे में मछली मारने को लेकर विवाद हुआ इससे नाराज होकर अभिमान सिंह जौनपुर चले आये और इस्लाम धर्म में दिक्षित होकर एक मदरसे में पढने लगे। इस्लाम स्वीकार कर लेने के बाद इनका नाम दौलत खां पड़ गया। शरीर के मजबूत दौलत खां का दिमाग भी ठीक ठाक था सो वह अरबी और फारसी भी जल्द सीख गये। यह नौकरी की तलाश में जौनपुर से आगरा आ गये। दौलत खां ने शाही फौज में घुड़सवार की नौकरी पा गये और अपनी मेहनत के दम पर तरक्की करते चले गये और शिघ्र ही शाही परिवार के रनिवास के सुरक्षा अधिकारी के रूप में तैनात हो गये। जहांगीर के शासन काल में यह राजमहल में नाजिर के पद पर रखे गये। सम्राट जहांगीर ने इनकी सेवाओं से प्रसन्न होकर इन्हे इनकी इच्छानुसार सूबा इलाहाबाद के जौनपुर सरकार के अंतर्गत सन् 1609 ईसवी में 22 परगनों की एक बड़ी जागीर प्रदान कर दी और एक फरमान जारी करके इन्हे राजा की उपाधि दे दी गयी। शाही सेना में रहते हुए दौलत खां उर्फ अभिमान सिंह ने शादी नहीं की इस कारण इन्हे अपनी कोई औलाद नही थी। इन्होने अपने भाई सागर ंिसंह के पुत्र हरिवंश सिंह को अपनी जागीर सौंप दी। उस समय की परम्परा के अनुसार हरिवंश ंिसह को राजा बनने के लिए इस्लाम स्वीकार करना पड़ा तथा पुन: एक मुस्लिम लड़की से शादी करनी पड़ी। बिरादरी में अंसतोष बढ़ने लगा। विवश होकर हरिवंश सिंह ने अपना पैतृक गांव छोड़कर मेंहनगर मे एक किला बनवाकर रहने लगे। सन् 1650 मंे मेंहनगर का किला बना और यहीं से 22 परगनों की हुकूमत होती थी। राजा हरिवंश के परिवार में असंतोष बढ़ता ही रहा उनकी हिंदू रानी रतन ज्योति ने अपने पति का घर छोड़ दिया और एक गांव में जाकर सराय बनवाकर रहने लगी जो कालांतर मंे रानी की सराय नाम से प्रसिद्ध हुआ और आज भी यह बाजार रानी रतन ज्योति की याद दिलाता है। रानी अपने दो पु़त्रों धरणीधर और गंभीर में से धरणीधर को अपने साथ लेकर आयी थी। राजा हरिवंश सम्राट शाहजहां के शासन काल में 1629 तक जीवित रहे। उनकी मृत्यु के बाद गंभीर ने शासन संभाला परंतु उसे लोगों का विस्वास नही मिला और उसकी हत्या कर दी गयी। उसकी हत्या के बाद धरणीधर यहां के शासक हुए। शहर का हरिवंशपुर मुहल्ला और गंभीरवन इन्ही शासकों की याद दिलाता है। धरणीधर के तीन पुत्र हुए विक्रमादित्य, नारायण दत्त और रूद्रप्रताप शाह। जब धरणीधर ने अपनी सम्पत्ति में से कुछ भाग अपने नाती को देना चाहा तो विक्रमादित्य ने उनकी हत्या कर दी। धरणीधर की विधवा रानी भवानी कुंवर ने तत्कालीन सम्राट औरंगजेब से इसकी फरियाद की जिस पर औरंगजेब ने विक्रमादित्य को दिल्ली बुलवाया और इस्लाम स्वीकार करने पर माफी दे दी। विक्रमादित्य के इस्लाम स्वीकार करने पर इनकी हिंदु रानी ने इनसे नाता तोड़ लिया। विक्रमादित्य के मुस्लिम बीबी से दो पुत्र हुए आजम शाह और अजमत शाह। आजमशाह के नाम पर आजमगढ़ और अजमत शाह के नाम पर अजमतगढ़ बसा। इतिहास यूं ही रक्त रंजित होता है और अक्सर इसके हाथ खून से सने होते हैं। जिस जनपद पर इस कदर मुस्लिम प्रभाव रहा हो कि उसका उद्भव उसके नाम से हो रहा हो तो उस जनपद में यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस्लाम ने यहां अच्छी तरीके से अपना प्रभाव जमाया। यही कारण रहा कि तत्कालीन सरकार की नीतियों की वजह से यहां इस्लामिक शिक्षा और संस्कृति का ज्यादा प्रभाव रहा। आज भी कई गांव ऐसे मिल जाते हैं जो वर्तमान में इस्लाम को अपनाये हुए है वहां के वाशिंदें कट्टर मुसलमान हैं लेकिन उनके पूर्वजों की खतौनी में हिंदू नाम दर्ज है। जनपद अपनी आबादी की लिहाज से पूरे प्रदेश में एक स्थान रखता है, कोई औद्योगिक पृष्ठभूमि न होने के कारण केवल खेती ही मुख्य सहारा है। ऐसे में एक-एक इंच जमीन के लिए जान लड़ा देना यहां के लोगों के खून में ही शामिल हो गया है। 45 लाख की आबादी के हिसाब से अनुमान लगाये तो एक व्यक्ति के जिम्मे आधा बिसवा से कम जमीन आती है। सामान्य की अपेक्षा धार्मिक शिक्षा का ज्यादा प्रभाव होना, आर्थिक बदहाली, खेती योग्य जमीन का कम होना प्रमुख कारण हैं जो इस जमीन को आपराधिक रूप से उर्वर बना देते हैं। रोजी रोटी की चक्कर में यहां से पलायन भी खूब हुआ। पहले तो रोजी रोटी के लिए अब यहां से बौद्धिक पलायन भी खूब हो रहा है। जहां अंधेरा ही अंधेरा हो वहां कुछ नौजवानों का भटक जाना स्वाभाविक सा लगता है। यहीं कारण रहा है कि कभी राहुल सांकृत्यायन, पंडित लक्ष्मी नारायण मिश्र, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, कैफी आजमी का आजमगढ़ अब चंद भटके हुए नौजवानों की नाम से पहचाना जाने लगा है। अगर राजनैतिक चेतना और इच्छाशक्ति ने इस जनपद की ओर ध्यान नही दिया तो इस भटकाव को रोकना भी मुश्किल सा लग रहा है। जरूरत है जनपद के बेसिक आर्थिक ढांचे को मजबूत करने की तथा शिक्षा की बुनियादी जरूरतों को पूरा करते हुए उसके भरपूर आधुनिकीकरण की। आज दर्जनों नये चेहरे आजमगढ़ की तश्वीर बदलने के लिए मशक्कत कर रहे हैं इन्हे बढ़ावा देने के साथ ही साथ इस जनपद की परम्परा संस्कृति और साहित्यिक विरासत को नया आयाम देने की आवश्यकता है।


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