जमानत
वकील साहब! इसका भी कुछ भला करिये,
एक सिपाही कृशकाय हो चले अधेड़ की ओर ईशारा करते हुए कहा।
वकील राधेमोहन मिश्रा जो अपने दो मुवक्किलों के जमानत के कागजात तैयार कर रहे थे, अपने नाक पर उतर आये चश्मे को ठीक करते हुए सिर उठाये तो देखे कि एक व्यक्ति जो 65 की उम्र में 85 का नजर आ रहा था आशा और निराशा के मिश्रित भाव लिये वकील साहब को निहार रहा था। वकील साहब ने कहा कि अरे दीवान जी ! कुछ है भी इसके पास। दीवान जी ने कहा कि पुलिस गई तो यह अपने पड़ोसियों को गाली दे रहा था, शांति भंग की आशंका में पुलिस इसके पड़ोसियों के साथ-साथ इसको भी ले आयी, ताकी कार्रवाई दोनों पक्ष पर हो।
151 की कार्रवाई है वकील साहब देख लीजिये ।
वकील साहब ने पूछा है कोई है तुम्हारे साथ ? अधेड़ ने जवाब दिया नाही साहब अकेले हईं, न मेहरारू, न लइका। खाना पानी कैसे होता है ? अगला सवाल, अधेड़ ने जवाब दिया एक ठे फूस क झोपड़ी हव साहब , एक ठे भदेली और कुछ बरतन हव कहीं से कुछ मिल जाला त बना लेईला नाही तो मांग जोंग के खा लेईला, मिलल तो ठीक नाहीं सरजू मईया का पानी साहब बड़ा मीठ लगेला। वकील साहब ने सिपाही को समझाते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट साहब यार बहुत कानून के पक्के हैं अगर दो जमानतदार न हो और जरा सा भी कागज में कमी बेसी हो तो मुवक्कील की जमानत खारिज कर जेल भेज देते हैं। नये- नये आईएएस हैं, अभी एसडीएम बने हैं, जरा सा भी गुंजाइश का मौका नहीं देते, केवल कागज और कानून की भाषा ही बोलते हैं, व्यवहार से परे हैं।
सिपाही ने अपने सिर की मुसीबत टालते हुए कहा अरे वकील साहब कुछ हिकमत लगाईये।
राधेमोहन मिश्रा थे तो वकील लेकिन पेशे के रंग में पूरी तरह से रंगे नही थे। उनकी पेशानी पर बल थे, बोहनी खराब होने का मलाल भी था। उन्होने अधेड़ से झुंझलाते हुए कहा कि इससे अच्छा तो तुम जेल में ही चले जाते, सुबह नाश्ते में चना मिलेगा, पहनने के लिए कपड़ा मिल जायेगा, नहीं चार तो दो रोटी मिल ही जायेगी अगर बीमार पड़ गये तो दवा भी लोग करायेंगें, वकील साहब अपनी रौ में बोले जा रहे थे, इधर अधेड़ के आंखों की चमक बढ़ती जा रही थी।
उसने तहसील तक ले आने वाले सिपाही से पूछा सच में साहब! अईसन होला का ? सिपाही ने कहा, हां
अधेड़ ने कहा तब साहब ! हमें जेलवे में भेज दा।
वकील साहब चुपचाप अपने अधेड़ मुुवक्कील को देख रहे थे।
उपजिलाधिकारी के कोर्ट का समय हो गया। अधेड़ के दो विरोधियों की जमानत हो गयी। अधेड़ पेश हुआ
मजिस्ट्रेट- कौन हैं तुम्हारे वकील
अधेड़ राधेमोहन मिश्रा की ओर देखता है, मजिस्ट्रेट की निगाह उनकी ओर घूमती है।
वकील- साहब यह मेरे मुवक्कील हैं और मैं ही इनकी पैरवी कर रहा हूं।
मजिस्ट्रेट - वकील साहब ! क्या करते हैं आप लोग, जमानत के पेपर अधूरे हैं। बताईये ऐसे कैसे काम होगा, कागज भी ठीक-ठाक से नही तैयार करते हैं उस पर से कहेंगें की साहब रिहा कर दीजिये। कम से कम दो जमानत दार चाहिये नहीं तो जेल जाना पड़ेगा।
वकील- श्रीमान, कौन कह रहा है, इन्हे जेल मत भेजिये भेज दीजिये, पर पूरी बात तो सुन लीजिये।
मजिस्ट्रेट- कहिये
वकील राधेमोहन हूबहू पूरी बात मजिस्ट्रेट के सामने बयां कर देते हैं तथा कहते हैं कि यह आदमी तन्हा है, मांगता खाता है, न कोई जमानतदार है इसके पास न वकील की फीश के पैसे हैं, न कागज न पत्र, यह जेल जाने को भी इस गरज से तैयार है कि वहां खाने को मिल जायेंगे।
मजिस्ट्रेट- जब इसके पास कुछ नही है तो इसे पकड़ा क्यों गया?
मजिस्ट्रेट अधेड़ के हल्के के दरोगा से पूछते हैं कि उसने ऐसे आदमी को क्यों गिरफ्तार किया। दरोगा जी ने सफाई देते हुए कहा कि सर यह अपने पड़ोसियों को गाली दे रहा था, शांति भंग की आशंका थी इसलिए इसे गिरफ्तार किया गया है।
मजिस्ट्रेट- तुमने अपने पड़ोसियों को गाली क्यों दी ?
अधेड़- साहब ! मांग के चावल लियायल रहनी, भात बनाके रखले रहनी खायेके, साहब इन लोगन का कुक्कूर आके साहब हमार खाना खा गईल। ऐहीसे साहब हम भूखल पेट इन लोगन के गरियावत रहनी। सिपाही लोगन इनके यहां बईठे उठे न हमके पकड़ लियायल लोग।
(मजिस्ट्रेट साहब न जमानतदार, न कागज, न पर्सनल बाण्ड कुछ नहीं मांगें और अधेड़ को रिहा कर दिये।)
अधेड़- वकील साहब आप त कहला की जेल भेजींह ई त कहन कि घरे जा, लगत हव कि दू रोटी क ईहो आस गईल ।
मनमसोसता अधेड़ तेजी से बस्ती की ओर बढ़ता चला जा रहा था।
pradeep tiwari

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