आखिर कब लेगें सुध गोगा और भीखी की कुर्बानी का ?
1857 की क्रांति के नायक वीर कुवर सिंह की मदद के बदले मिली थी कालापानी की सजा
राजनीतिज्ञों और प्रशासन ने भुलाया
वंशज कर रहे मंदिर और ऐतिहासिक सुरंग की देखभालआजमगढ़। ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी में जकड़ी भारत माता की आजादी के लिए कई लड़ाईयां लड़ी गई। इतिहास प्रसिद्ध 1857 की क्रांति का जिक्र जब आता है तो आजमगढ़ जनपद के लोगों को खुद पर गर्व होने लगता है। इस क्रांति में जनपद के लोगों ने सीधे प्रतिभाग किया था। परंतु जिस शख्स ने आजमगढ में क्रांति की मशाल जलाई वो थे वीर कुंवर सिंह । जगदीशपुर के राजपूत जमींदार कुंवर साहब ने न केवल अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था, वरन अपनी हवेली में स्थापित बन्दूकों व गोलों के कारखाने से क्रांतिकारियों की मदद भी करते थे। चार हजार सैनिकों की सहायता से कुंवर सिंह ने आरा बिहार पर कब्जा कर लिया । अंग्रेजों की दमनात्मक कार्रवाई से कुंवर सिंह जरा सा भी विचलित नही हुए अंग्रेजों की विशाल फौज ने पहले आरा फिर जगदीशपुर पर कब्जा कर लिया तथा कुंवर सिंह के कारखाने को नष्ट कर दिया। परिस्थितियों से घिरे कुंवर साहब तात्या टोपे से सम्पर्क करने के बाद लखनऊ पहुचे जहां अवध के शाह ने हजारो रूपये एवं आजमगढ़ जिला को जीतने का फरमान दिया बतया जाता है कि आजमगढ़ को जीतने के बाद कुंवर साहब ने यहां बाकयदा कुछ दिनों तक शासन भी किये। अंग्रेजों के बढ़ रहे लगातार दबाव एवं हो रहे छोटे-छोटे युद्धों के अलावा तत्कालीन गर्वनर जर्नल लार्ड कैनिंग के किसी भी सूरत में पकड़ने के आदेश को देखते हुए कुंवर साहब ने आजमगढ़ छोड़ने का निर्णय लिया। अतरौलिया और मदूरी जैसे बड़े परगने भी कुंवर साहब की मदद को आगे नही आये। बलिया की ओर बढ़ रहे कुंवर साहब बनकट बाजार के निकट बगहीडाढ़ के पुल को पार किया तथा नदी पर बने पुल को उड़ा दिया जिससे उनके पीछे आ रहे अंग्रेज सैनिक हाथ मलते रहे गये। थके हारे और घायल सैनिकों के साथ कुंवर साहब वतन पर कुर्बान होने का जज्बा लिये आगे बढ़ रहे थे परंतु अंग्रेजी हुकूमत की खौफ के कारण कोई भी उनकी मदद को आगे नही आया। कुंवर साहब को क्या पता था कि अतरौलिया जैसी बड़ी रियासत से ठुकराये जाने के बाद भी अजमतगढ़ जैसी छोटी रियासत के व्यापारी उनकी मदद को आगे आयेंगे। वे इतिहास प्रसिद्ध व्यापारी थे गोगा व भीखी साव जिन्हे अंग्रेजी हुकूमत का खौफ डरा न सका। जिन्होने कुंवर साहब की मदद के लिए अपने खजाने का मुंह खोल दिया तथा वतन परस्ती का ऐसा उदाहरण पेश किया जो भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास का अभिन्न अंग बन गया। गोगा साव व भीखी साव का जन्म तत्कालीन अजमतगढ़ रियासत के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता बेनी प्रसाद धार्मिक व समाज सेवी के रूप में क्षेत्र में विख्यात थे। गोगा व भीखी अनन्य शिव भक्त थे इनके द्वारा बनवाये गये शिव मंदिर बरहज, जीयनपुर, बनकट, अजमतगढ़ में आज भी हैं।
दोनो भाईयों में से गोगा साव विवाहित व भीखी अविवाहित थे। गोगा साव गल्ले के बड़े व्यवसाई थे तथा खांडसारी के कारखाने चलाते थे। गोगा साव का व्यापार कलकत्ता से लेकर देशी व गंवई बाजारो में फैला हुआ था। गोगा साव के कारखाने में बनने वाले गुड़ का संग्रह एक विशाल गड्ढे में होता जो आज भी मंदिर के सामने एक विशाल तालाब के रूप में उपस्थित है। गोगा व भीखी ने सुरक्षा की दृष्टि से शिव मंदिर के बगल में बजरंग बली के मंदिर से एक सुरंग भी खुदवाई थी। सुरंग व उसमें बने कमरे आज भी उपस्थित है। जब कुंवर साहब की सेना अजमतगढ़ पहुंची तो गोगा व भीखी ने जमकर आगवानी की। तथा अपने स्थापित सात कुओं में अपने ही कारखाने में बनी चीनियों के बोरेे डालकर शरबत बनवाया और सैनिकों के रहने खाने पीने की व्यवस्था भी किये। रूपये व धन देकर जंगे आजादी हेतु विदा किया। इन कुओं का जल आज भी मीठा है। गोगा व भीखी साव द्वारा कुंवर साहब की आगवानी तत्तकालीन दलालो को अच्छी न लगी। उन्होने इसकी सूचना अपने आकाओं को दे दी। हुकूमत ने गोगा व भीखी की गिरफ्तारी का फरमान जारी कर दिया । कहा जाता है कि गिरफ्तारी से पूर्व साव बन्धुओ ने अपने खजाने को चोटे की गड़ही में फेक दिया और अपने इकलौते पुत्र नारायण साव को बरहज भेज दिया। जनपद के गजेटियर में दर्ज है कि कि मार्च 1858 में वीर कुंवर सिंह एवं उनके लश्कर को गुप्त रूप से टिकाने और यथा संभव मदद करने की सूचना मुखबीरों द्वारा दिये जाने के कारण तत्कालीन अंग्रेज हुकूमत ने दोनो भाईयों व उनके परिवार तथा सम्पति कहर ढाना शुरू कर दिया। बगावत के इल्जाम में दोनो भाईयों पर पर मुकदमा चला और 18 सितम्बर सन 1858 को उनको काला पानी की सजा दे दी गई। कालापानी जाते समय गोगा व भीखी साव ने हीरे की अंगूठी चाट कर अपनी इहलीला समाप्त कर ली। तत्कालीन हुकूमत ने सब तहस-नहस कर डाला उनके वंशज कंगाल हो गये। उनकी छठी पीढ़ी के कुछ वंशज जीयनपुर बाजार में छोटा-मोटा कारोबार कर रहे हैं बाकी बरहज व अन्य स्थानों पर है। जीयनपुर में बसे वंशज गोगा साव के पूर्वजों द्वारा बनवाये गये भव्य मंदिर की देखभाल करते हैं। मंदिर के अंदर के सुंरग के अंत का पता करने का प्रयास होता तो आजादी की लड़ाई की कई और कड़िया खुल कर सामने आती।
मंदिर के खाली जमीन लावारीश हालत में पडी है कुछ अवैध कब्जा हो गया है। इस ऐतिहासिक धरोहर की न तो प्रशासन और न ही राजनीतिज्ञ सुध ले रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री प्रकाश जायसवाल ने कुछ वर्ष पूर्व दोनो भाईयों की प्रतिमा का अजमतगढ़ के प्रवेश द्वार पर लोकार्पण किया था। सवाल वही है कि आखिर कब 1857 क्रांति की कुर्बानियों का क्या कोई मोल नही है ? आखिर कब इनके आश्रितों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का लाभ मिलेगा ? क्या सरकारों का काई दायित्व नही है ?


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