कब खत्म होगा शिक्षक भर्ती का सरकारी बैर?
आजमगढ़। उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था किस स्तर पर पहुंच चुकी है वह सबके सामने आ रहा है। उत्तर प्रदेश बोर्ड खाली होता जा रहा है। हिंदी पट्टी के बच्चे बहुतायत की संख्या में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा की ओर पलायन कर रहे हैं। प्राथमिक विद्यालयों की हालत इस कदर बदतर है कि कई-कई विद्यालय आज भी एकल शिक्षकों परआधारित हैं। कई ऐसे भी परिषदीय विद्यालय है जों अध्यापक विहीन हैं। क्या उत्तर प्रदेश में शिक्षक बनने योग्य पढ़े लिखे लोगों की कमी हो गई या फिर प्रदेश सरकार ने शिक्षक भर्ती से बैर पाल रखा है।
राजनीति ने किस तरह से प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था का बंटाधार किया है किसी भी बुद्धिजीवी से छुपा नही हैं। हम अगर बात करें 72825 प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती तो विवादों की एक लम्बी श्रृंखला सामने उभ र कर आती है। तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने अपने सरकार के अंत समय में भर्ती निकाल कर अपनी मंशा साफ जाहिर कर दी थी कि वह इस भर्तीका राजनीतिक लाभ लेना चाहती हैं। अगर उनकी मंशा साफ होती तो वह भर्ती ऐसे समय निकालती कि वहअपने कार्यकाल में ही भर्ती को पूर्ण करा देती। प्रदेश में उनके बाद समाजवादी पार्टी की सरकार आई। इस सरकार ने सत्ता में आने से पहले ही टीईटी 2011 को निरस्त करने व शिक्षा मित्रों को सहायक अध्यापक बनाने का वादा किया। सरकार सपा की बनी और उसने एक कमेटी बनाकर जांच भी कराई जिसे जावेद उस्मानी कमेटी कहते हैं लेकिन वह तथ्यों के आधार पर टीईटी 2011 को रद्द नही कर सकी। हाईकोर्ट से लगायत सुप्रीम कोर्ट ने इसके हक में फैसला दिया। अब सवाल यह है कि क्या प्रदेश में ऐसे निति निर्धारकों को अकाल पड़ गया है जो पाक-साफ शिक्षक भर्ती की नीति बनायें। यह प्रदेश जितना मुलायम जी का है उतना ही मायावती जी का । वर्तमान में राजनीति भर्ती इन्ही लोगों की पार्टियों के इर्द गिर्द घूम रही है। क्या पढ़े लिखे योग्य लोगों को चुनने का मानक अलग- अलग हो सकता है। राजनीति के चश्में को उतारकर निति निर्धारक केवल एक बार योग्य लोगों की भर्ती करते तो प्रदेश में शिक्षा की तश्वीर बदल जाती। इस भर्ती के आवेदक पग- पग पर आंदोलन कर रहे हैं। अभी कुछ दिनों पूर्व इलाहाबाद में बेसिक शिक्षा सचिव के कार्यालय पर पूरे प्रदेश से हजारों ऐसे प्रशिक्षु शिक्षक जुटे जो अपना प्रशिक्षण पूर्ण कर चुके थे और अपनी मौलिक नियुक्ति मांग रहे थे। आंदोलन से विवश होकर अन्तत: सचिव साहब को सभी बीएसए के नाम मौलिक नियुक्ति का लेटर जारी करना पड़ा। यह काम आंदोलन से पूर्व भी हो सकता था लेकिन हुआ तो आंदोलन के बाद। आखिर शिर्ष पर बैठे अधिकारियों कि कौन सी मजबूरी जो उन्हे संविधान सम्मत कार्य करने से रोकती है। क्या ये लोग निजी हितों को किनारे रखकर एक बार भी स्वच्छ मन से प्रदेश सरकार की शिक्षा व्यवस्था को सुधारने का प्रयास करेंगें। आजकल इन्ही प्रशिक्षुओं की भर्ती के दौरान फिर से इन्हे आदोलन के लिए विवश किया जा रहा है कारण यह है कि नियुक्ति के दौरान अधिकांश जिलों में सबसे विकल्प लिये गये। एक बार विकल्प पर शिक्षकोें की भर्ती की गई । मौलिक नियुक्ति के दौरान रोस्टर के नाम पर इन्हे दूर- दराज इलाकों में भेजने की तैयारी है। इस प्रक्रिया के दौरान शिक्षा विभाग के अधिकारी जमकर खेल करते हैं और पूरी प्रक्रिया पूजा पाठ और चढ़ावे के अधीन रहती है। होता ये कि मेरिट के अनुसार शिक्षकों से विकल्प लिये जाते जिससे उनका हौसला अफजाई होता लेकिन यह पूरी प्रक्रिया लक पर आधारित हो जाती है। अच्छे अंकों से पास प्रशिक्षु दूर दराज इलाकों में चला जाता है और कम अंकों से उत्तीर्ण पास प्रशिक्षु अपने घर के पास नौकरी करता है। क्या अधिकारियों के संज्ञान में यह समस्या नही है? अगर है तो समय रहते क्यों न इसका समाधान कर देते ? इन्हे तो आंदोलन कराने की आदत पड़ गई है। हर बार आंदोलन पर समस्या का समाधान निकाला जाना दुर्भाग्य पूर्ण है। न जाने कब शिक्षा के निति निर्धारकों को सद्बुद्धि आयेगी और न जाने कब एक पाक-साफ शिक्षा नीति से प्रदेश के लोगों का सरोकार होगा।
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