" अधूरा मन "
सितम्बर महीने का आखिरी समय चल रहा था, लौटते हुये मानसून की आखिरी बरसात हो रही थी, आसमान में छाये बादल और उनसे बरस रही बूंदें रह -रह के तेज और धीमी हो रही थीं, साथ में हवा के झोंकें पूरे मौसम को सुहावना बनाये हुये थे। समीर ने अपने लैपटाप को खोला और उसकी उंगलियां की बोर्ड पर चलने लगीं जिसके साथ ही नोटबुक पर कुछ छपने लगा था। स्पाटीफाई पर तलत अजीज और लता मंगेशकर की आवाज में एक गजल ....फिर छीड़ी रात बात फूलों की ़़़़़़़़़़़़़़़़़़........ अपनी मधूर स्वर लहरियां बिखेर रहीं थी। सर्द हवा जब भी समीर के बदन से टकराती उसे बहुत अच्छा लगता। थोड़ी देर आफिस का काम निपटाने के बाद उसने अपनी मोबाइल खोल ली, जैसे ही उसने अपना व्हाट्सएप खोला, चारू के कई मैसेज पड़े हुये थे। “तुम्हे मेरा हाल पूछना हो तो खुद ही पूछ सकते हो किसी दूसरे से पूछने की कोई जरूरत नही हैं“। चारू के इस मैसेज को पढ़ के समीर के चेहरे पर मुस्कुराहट आ चुकी थी वो समझ चुका था कि चारू का गुस्सा नार्मल हो चुका है तभी वह इस तरह का मैसेज भेजी है।
चारू, समीर के ही कंपनी में काम करती थी लेकिन सेक्शन अलग था, मगर दोनो की ट्रेनिंग साथ हुई थी तो थोड़ा परिचय पहले का था लेकिन अब साथ काम करते थे, यूं समझ लीजिये कि कंपनी एक ही, ब्रांच अलग-अलग। चारू भरे पूरे शरीर की एक आकर्षक महिला थी, लड़कियों का अल्हड़पन उसमे कम ही दिखाई देता, आफिस में वह सबसे काम से काम ही रहती थी। अपने काम को परफेक्शन से करना उसे बहुत भाता था। कोई भी बहुत कुछ चारू के जीवन के बारे में बहुत नही जान पाता था, वह किसी से कुछ शेयर ही नही करती थी। वह एक हास्टल में रह कर नौकरी कर रही थी।
चारू एक हफ्ते से समीर से नाराज थी, सो उन दोनो बात-चीत बंद थीं। दोनो कुछ इस तरह की शर्तों में बंधे थे कि वो केवल चैटिंग कर सकते थे, न तो काल पर बात और न ही वीडियो काल, न ही आमने-सामने मुलाकात। ये शर्तें चारू ने ही रखीं थी। एक पुरूष कब से इतना धैर्यशाली होने लगा कि वो किसी लड़की से अपनी भावनायें शेयर करे और उससे मिलने से दूर रहे। यद्यपि दोनो ट्रेनिंग के दौरान मिले थे, एक दूसरे से बातें भी की थीं समीर तब उसके बैक ग्राउंड के बारे में बहुत कुछ नही जान पाया था । अब जब से समीर से चारू की बातचीत हो रही थी, चारू का कहना था कि तब मेरे मन में कोई फीलिंग नही थी, अब मेरी यही शर्त है कि तुमको अगर मुझसे दोस्ती रखनी है तो तुम मेरे सामने नही आओगे। समीर को चारू अच्छी लगती थी, वो किसी भी कीमत पर चारू को खुद से दूर नही होने देना चाह रहा था इसलिये न चाहते हुये उसने चारू की शर्ते कबूल कर रखी थीं। आज बड़े ही अनमने ढंग से समीर चारू से चैटिंग कर रहा था, एक्चुअली, चारू ने आज फिर समीर को हर्ट कर दिया था, समीर ने चैटिंग में चारू से मिलने की गुजारिश की, चारू का सीधा सा इंकार, समीर को हर्ट कर गया, और जब शाम को दोनो मेें चैटिंग शुरू हुई तो समीर, चारू के हर सवाल का जवाब हूं, हां में देता रहा, चारू खीझ उठी, उसने कहा, ये क्या है समीर ? अगर तुम्हारा मन न हो बात करने का तो बता दो, लेकिन प्लीज! कम से कम ऐसे बिहैव तो मत करो कि जैसे तुम मुझे झेल रहे हो, समीर इस बार कोई रिप्लाई नही किया। समीर के रिप्लाई न करने से चारू का गुस्सा और बढ़ गया उसने लगभग झल्लाते हुये कहा कि अब जब तुम्हारा मन होगा तभी बात होगी यह मैसेज करते हुये चारू ने नेट ऑफ कर दिया और लगभग गुस्से से हांफते हुये वह बेड पर पहुंच चुकी थी, उसका मूड खराब हो चुका था। इधर समीर ने भी सोचा कि चलो, चारू का कल तक मूड ठीक हो ही जायेगा तो मैसेज वो कर ही देगी। आम तौर पर उन दोनो में ऐसी लड़ाईयां होती रहती थी, हर बार चारू पहल करके समीर को मना ही लेती थी। ऐसे समय में समीर का पुरूषत्व पुष्ट हो उठता था। अगले दिन रोज की तरह समीर की आंख खुली तो लगभग आंख को मींजते हुये स्क्राल करने लगा, व्हाट्सएप खोला लेकिन चारू का मैसेज नदारद था, यहां तक कि उसने खुद को लगभग गायब ही कर लिया था, उसका न तो लास्ट सीन दिख रहा था और न प्रोफाइल फोटो न ही कोई मैसेज, समीर परेशान तो हुआ लेकिन यह सोच कर कि कब तक वो गायब रहेगी ? मैसेज तो वो करेगी ही। समीर अपनी दिनचर्या में व्यस्त तो हुआ लेकिन उसका मन मोबाइल में ही अटका रहा, वह जब मौका मिलता बरबस ही उंगलियां मोबाइल की स्क्रीन पर फिराने लगता, सुबह से शाम हो गई लेकिन चारू का मैसेज न आया। समीर का मन तो किया कि वो मैसेज कर ले लेकिन उसका पुरूषत्व उसे रोके हुये था, फिर समीर अपने मन को यह दिलासा दे रहा था कि उसे चैटिंग से भगाने का काम तो चारू ने ही किया है तो वो पहले क्यूं मैसेज करे ? सुबह से शाम और शाम से सुबह होने लगी चारू का मैसेज न आया इस दौरान चारू किस हाल मे हैं ? सोशल मीडिया पर एक्टिव है या नही जानने के लिये चूंकि व्हाट्सएप से सारे सूचनायें चारू ऑफ कर रखी थी, सो समीर फेसबुक के मैसेंजर से चारू की एक्टिवीटी का निहारा करता था। धीरे-धीरे एक सप्ताह का दिन बीत गया चारू का कोई जवाब नही आया। एक अजीब सी बेचैनी इन दिनो समीर के साथ रही, हर पल चारू का ही ध्यान रहा, उसके चेहरे की मुस्कुराहट गायब रहने लगी। अब तो उसका किसी काम मे मन न लगता। आफिस में गलतियां होने लगी वो सबसे अलग -थलग एक कुर्सी पर बैठा, मोबाइल ही निहारा करता था, उसे हर पल यही लगता था कि चारू का मैसेज अब तो आ गया होगा और मोबाइल खोल वो स्क्राल करने लगता। चारू की बेरूखी उसे बर्दाश्त से बाहर होने लगी, गुस्सा भी आ रहा था उसे और वह मायूस भी हो रहा था। आठवें दिन उसका पुरूषत्व हार ही गया, वो बेचैन होकर चारू को मैसेज कर दिया कि बात करनी है या नही ? ऐसा लगा कि जैसे चारू को भी समीर के मैसेज का ही इंतजार हो झटपट जवाब आया, जब तुमको मुझे एवायड ही करना है तो क्या बात करूं ? शिकायतों और मान मनौवल का लंबा दौर चला। चारू ने कहा छोड़ो सब, अब मत गुस्सा होना और न मुझसे बात बंद करना, बोलो ! नहीं करोगे न ? यार, समीर मुझे तुम्हारी आदत हो गई है, मैं खुश रहने लगी हूं, तुमसे बात करना अच्छा लगता है बेवजह फेस पर स्माइल रहती है। समझो न यार, मैं मिल नही सकती, मैं कोई ऐसा काम नही करना चाहती जिससे मैं खुद की नजरों में गिर जाऊं। समीर भी इस समय लड़ने का मूड में जरा भी न था, चारू का पलट कर तुरंत जवाब देना समीर को यह एहसास करा गया कि चारू भी उतनी ही बेचैन थी जितना की वह। एक बार फिर से वोे दोनो अपने पुराने रूटीन पर थे, बातें होने लगीं जब मौका मिलता दोनो आनलाइन चैटिंग में व्यस्त हो जाते। अपने आप में मुस्कुराते रहते, इधर- उधर की बतियाते रहते बात ही न खत्म होती उन दोनो की । खैर दोनो खुश थे, जब कभी चैटिंग के दौरान समीर रोमांटिक होने की कोशिश करता चारू सतर्क हो जाती और जोर से डांट पिलाती। धीरे-धीरे समीर भी चारू से दोस्ती न छूटे इस वजह से ऐसी बातें न करता जिसमें रोमांस हो। दिन, महीने बीतने लगे, अब तो मोबाइल उन दोनो की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया था। चैटिंग की भी एक सीमा होती होगी बिना किसी मुलाकात के इतनी बातें उफ! ऐसा भी नही था कि दोनो का कभी आमना-सामना न होता कंपनी के काम से महीने में एक दो बार देखा ताकी हो जाती थी, उस देखा-ताकी को ही चारू मुलाकात कहती थी, और समीर से कहती थी कि मिले थे तो उस दिन । उन दोनो में कभी ऐसा न हुआ कि वे ऐसे मिले हों जहां केवल वे दोनो हों चाहे वह सार्वजनिक प्लेस रहा हो या कोई अन्य जगह। धीरे-धीरे जाड़े का मौसम विदा ले रहा था, समीर खासा खुश रहता, कभी चारू गलती से भी कह देती कि ‘मिलेगंे‘ तो उस दिन समीर कुछ ज्यादा बन संवर के कंपनी जाता, लेकिन चारू एक छलावा साबित होती कोई न कोई बहाना करके समीर को समझा ही देती। पुरूष एक सीमा तक ही खुद को रोक पाता है, वह भी एक स्त्री को लेकर। यह पुरूषों के जीन्स में ही नही है कि वह एक स्त्री से केवल भावनात्मक रूप से जुड़ा रहे शारीरिक रूप से नही और वह भी आज के माहौल में जहां पूरा इंटरनेट, सोशल मीडिया के प्लेटफार्म केवल स्त्री-पुरूष सम्बंधो को ही परोस रहे हों। समीर का मन भी विचलित होता, वह भी चारू को अपनी बाहों में भरना चाहता था, उसे दुलारना चाहता था वह कई बार तो चैटिंग के माध्यम से वह चारू को अपनी भावनाओं से अवगत करा भी चुका था कि मिलोगी तो केवल एक काम करूंगा, चारू अगर पूछती, क्या ? तो कहता कि तुम्हे गले लगाऊंगा, और तुम्हारा माथा चूमूंगा। चारू पूछती इससे ज्यादा कुछ करोगे तब ? तो समीर झट से कहता कि नही यार, कुछ नही करूंगा। तो चारू हंस कर कहती कि फिर किसलिये मिलोगे ? दोनो हंसने लगते इसी तरह के मजाक में चारू समीर को मिलने के मुद्दे पर टाल ही देती। समीर ऑफर और इंकार दोनो के बीच हिचकोले खाता रहता। अब समीर चारू पर दबाव बढ़ाने लगा था, यार! कम से कम किसी दिन तो मिलो, ये क्या तरीका है ? चारू कहती मिलेंगें यार, अभी क्या जल्दी है ? समीर को खुद को रोके रखना अब मुश्किल हो रहा था। दोनो के बीच नोक-झोक बढ़ने लगी थी। आये दिन लड़ाई होती, मोबाइल स्वीच ऑफ आन होती लेकिन दोनो की मुलाकात न हुई। समीर की जिंदगी में जब से चारू आई थी, तब से वह किसी और लड़की के बारे में सोचा भी न था, वह पूरी ईमानदारी से चारू को अपना समय दे रहा था । जब वह किसी जोड़े को आपस में इंज्वाय करते देखता उसका भी मन मचलने लगता। आज चारू ने मिलने का वादा कर रखा था, समीर कुछ ज्यादा ही खुश था, सुबह उठ कर वाश रूम गया, खुद अपनी शेव बनाया और अच्छे से तैयार होकर कंपनी के आफिस पहुंचा, अपना काम समय से निपटाया एक अजीब सी गुदगुदी उसके जेहन में थी। आफिस ऑफ होने के बाद वह अपनी बाइक लेकर चारू के आफिस के सामने खड़ा हो गया कि वादे के अनुसार चारू आफिस के बाद उसके साथ बाइक पर बैठकर किसी रेस्टोरेंट जायेगी जहां दोनो साथ में कॉफी पीयेंगें। चारू को आज भी न आना था वह न आई शाम के पांच बजे से छह बज चुके थे, समीर का धैर्य जवाब दे गया उसने अपनी बाइक की स्टैंड पर खड़ी की, और सीधा चारू के ऑफिस पहुंच गया, आज वह खासा गुस्से में था, उसने रिसेप्शन पर कहा कि चारू मैडम, को बता दिजीये कि समीर आया है। रिसेप्सनिस्ट ने कहा चारू मैडम! वो तो आज दोपहर ही अपने हसबैंड के साथ चली गई थी, और मिस्टर समीर, यह लिफाफा आपके लिये उन्होने दिया है। समीर हतप्रभ था, चारू शादी- शुदा थी, यह सोच-सोच कर वह परेशान हुये जा रहा था। वह लिफाफा लेकर तेजी से चारू के आफिस से बाहर निकला वह जल्द से जल्द अपनी बाइक के पास पहुंच जाना चाह रहा था। बाइक के पास पहुंचते ही उसने लगभग धड़कते दिल से लिफाफा खोला, समीर का माथा चकरा रहा था। लिफाफे में चारू ने एक पत्र लिख रखा था।
समीर धड़कते दिल से चारू के लिखे पत्र को पढ़ने लगा,
प्रिय समीर,
मुझे मॉफ कर देना, मैं तुमसे मिल नही सकी और चाह कर भी वो कुछ कर न सकी जिसकी तुम्हे इच्छा थी। एक स्त्री का जीवन कितना कठिन होता है ? यह तो तभी पता चलेगा जब कोई स्त्री बनकर जन्म ले। एक लड़की जब जन्म लेती है तब से ही उसके संघर्षों का दौर शुरू हो जाता है। तुम तो अभी भी परेशान होगे कि मैने शादी शुदा होते हुये तुमसे यह बात छिपाई क्यों ? दरअसल ट्रेनिंग के दौरान ही तुम मुझे अच्छे लगने लगे थे, मैं चाहती तो थी कि तुमसे अपने दिल की बात कहूं लेकिन हिम्मत न हो सकी । मैने यह सोच रखा था कि जैसे ही मेरी जाब स्थाई होगी मैं तुमसे अपने दिल की बात जरूर कहूंगी पर ऐसा हो न सका। किस्मत ने तो शायद कुछ और ही सोच रखा था। ट्रेनिंग के बाद मैं अपने घर गई पिता जी की हालत ठीक नही थी, उनको और मम्मी दोनो लोगों को मेरी शादी की चिंता खाये जा रही थी। भले ही समाज बदल रहा हो आधुनिकता अपने चरम पर हो पर आज भी घरों में सयानी होती लड़कियों को देख उनके मां पापा के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच ही जाती हैं यह ही आज के मध्यम वर्ग की सच्चाई है। किडनी की बीमारी से जूझ रहे मेरे पापा मेरी शादी अपने जीते जी कर देना चाह रहे थे । रिश्तेदारी में ही एक लड़के से जो उन्हे पसंद था और जिसकी दहेज की डिमांड कम थी मेरी शादी तय कर दिये। पापा की इच्छा के आगे मेरे मन की चाह दम तोड़ दी। अपने मृत्यु शय्या पर पड़े पिता की आखिरी इच्छा भी पूरी न करने वाली मैं एक अभागन के रूप में नही जीना चाहती थी। मेरी शादी निशांत से हो गई और मैं कुछ भी नही कर सकी सिवाय एक अजीब सी उलझन और अधूरी ख्वाइश के बीच झूलती हुई मायके से विदा होने के सिवा मेरे पास कोई रास्ता न बचा। निशांत एक बहुत अच्छे वकील हैं, अपने काम से काम रहना उन्हे ज्यादा पसंद है। इंसान बहुत अच्छे हैं लेकिन रिजर्व रहना उन्हे बहुत पसंद हैं। शादी से पहले ही जब वो मुझे देखने आये थे तभी मैने दबी जबान में अपनी इच्छा बता दी थी कि अगर मेरी जॉब लगती है तो मुझे प्लीज रोकियेगा मत, मैं जॉब करना चाहती हूं, तब निशांत ने कहा था कि ठीक है। शादी के दो महीने बाद मेरी जॉब लग गई, निशांत ने ही मेरे रहने की व्यवस्था हास्टल में करवा रखी थी जिस दिन मैं ज्वाइन की वह उसी दिन से मेरे ट्रांसफर की कोशिस में लग गये। यहां ज्वाइन करते ही मुझे तुम दिख गये, मेरे चेहरे पर सच्ची वाली खुशी दौड़ गई। खुश तो मै निशांत के साथ भी थी लेकिन यह खुशी कुछ अलग कुछ अपनी सी लग रही थी। मैं तो सोची कि तुमसे बता दूं कि मेरी शादी हो चुकी है लेकिन सच में यार ! कि कहीं तुम मुझसे दूर न हो जाओ मैं तुमसे यह बात छिपा ले गई, मैं सिंदूर भी लगाती रही तो बालों में छिपा कर हल्का सा। पता नही क्यों मैं तुम्हे खोने से डरने लगी थी। एक बार फिर मैं उलझ गई थी मैं तुम्हे छोड़ भी नही पा रही थी और तुमसे दूर भी नही जा पा रही थी। तुम मुझे मेरे अपने लगते थे। निशांत के साथ मै जितने दिन भी थी पूरी ईमानदारी से पत्नी धर्म का निर्वहन किया यह सत्य है। यह रिश्ता भले ही मेरे मन से न हुआ था लेकिन इसे निभाने में मैने कोई कोर -कसर नहीं छोड़ी। समीर अब मैं तुमसे क्या कहूं ? बस इतना समझ लो मेरा पूरी शरीर निशांत का लेकिन मन आधा ही उसका था। एक अजीब कसमकस में मेेरी जिंदगी उलझी हुई थी। सारी जिम्मेदारियां मेरे ही उपर थीं। निशांत मेरे ऊपर इतना भरोसा करते थे कि मैं चाह कर एक कदम भी तुम्हारी ओर न बढ़ा पाई। मैं तुम्हे हमेशा अपने एक अच्छे दोस्त के रूप में चाहा लेकिन तुम्हारी कोमल भावनायें जो दोस्ती और मोहब्बत में फर्क ही नही करने देती थी। यह सवाल मेरे मन मेें हमेशा उठता है क्या हम एक अच्छे दोस्त नही हो सकते थे ? यह समाज या मेरे पति निशांत ही तुम्हे मेरे दोस्त के रूप में स्वीकार क्यूं नही कर सकते ? क्या एक स्त्री और पुरूष मित्र नही हो सकते ? सच बताऊं समीर तो तुम्हारी प्यार भरी बातें मुझे बहुत अच्छी लगती थीं लेकिन एक ऐसा बंधन मेरे मन में बंधा हुआ था जो तुम्हारी ओर आने से मुझे रोके हुये था। तुम्हारी तरह मेरा भी मन होता था कि मैं तुमसे मिलूं, बातें करूं, करीब से देखूं, तुमसे आंखों मिलाऊं और मुस्कुराऊं लेकिन यार हिम्मत न हो सकी। हिम्मत इसलिये भी न हो सकी कि मैं तुमसे मिलकर बहक न जाऊं यही सोच मुझे रोके हुये थी और मैं कहीं कुछ ऐसा अगर कर बैठती तो जीवन भर मैं उस अपराध बोध से उबर नही पाती जो एक पत्नी अपने पति से छल करके हासिल करती है। प्रिय समीर मुझे माफ कर देना मैं तुम्हारी भावनाओं को वह स्थान नही दे सकी जिसके तुम हकदार थे, यह सच है मैं जानती हूं कि तुम्हारे मन में उगा प्रेम का अंकुर एक वृक्ष का आकार लेना चाहता रहा है, लेकिन मर्यादाओं की सीमा मैं लांघ नही सकी तुम जरूर यह कह सकते हो कि मैने तुम्हे धोखा दिया या तुम्हारे साथ छल किया, यह भी कहोगे कि मैने तुम्हारी भावनाओं के साथ खेला है तो भी मुझे बुरा नही लगेगा यार ! यह मेरा स्वार्थ ही कह लो कि मैने तुम्हे खोने की डर से तुम्हारी मासूम सी चाहत को तरजीह दी, जिसे तुमने मेरा अपने प्रति प्रेम समझ लिया। समीर न तो मैं तुम्हे छोड़ना चाहती थी, न दूर होना चाहती थी और यह भी नही था कि मैं तुम्हारे प्यार में पागल होकर तुम्हे अपना तन, मन सब सौंप देना चाहती थी यह एक ऐसी उलझन थी जिसे मैं सुलझा ही नही सकी। मेरा ट्रांसफर निशांत की कोशिशों से हो गया निशांत मुझे लेने आया है वह थक कर सो चुका है और मैं तुम्हे पत्र लिख रही हूं यह तुम्हे तब मिलेगा जब मैं तुमसे बहुत दूर जा चुकी होऊंगी। ट्रांसफर होने और अपने घर जाने की बधाई पूरे दिन मुझे मिलती रही मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट रही लेकिन दिल में कितना दर्द रहा यह मैं तुमसे बता नही सकती शायद तुम मेरे सामने होते तो मैं फफक कर रो पड़ती यार। तुमने मुझ पर बहुत एहसान किये हैं यार, इतने दिनों तक एक साये की तरह मेरा साथ दिये, सुख-दुख के साथी बने रहे, मेरे गुस्से और बदतमीजियों को भी झेला बदले में यार मैं तुमको कुछ नही दे सकी, एक मुलाकात के लिये भी तुमको तरसा दी। मैं जा तो रही हूं लेकिन मेरा मन तुम पर ही अटका हुआ है, तुम्हारा ही चेहरा मेरी आंखों के सामने नाच रहा है, तुम मेरी ऐसी जरूरत बन चुके थे, जो मेरे होकर भी मेरे नही हो सकते थे। पता नही तुम्हारे बिना मेरा किसी काम में मन लगेगा भी कि नही, मैं कुछ कर भी पाउंगी या नही तुम्हे इस तरह छोड़ने में मुझे बहुल गिल्ट फील आ रही, पर क्या करूं यार ? मैं पूरे शरीर लेकिन आधे मन से निशांत के साथ जा रही हूं मेरे आधे मन की जो तुम्हारे ख्यालों में डूबा हुआ है हो सके तो अपने दिल के किसी कोने में उसे थोड़ी सी जगह दे देना। समीर, एक बात और कहनी है भगवान पता नही मुझे माफ करेंगे कि नही यार लेकिन न जाने क्यूं मुझे तुम पर भरोसा है कि तुम मुझे माफ कर दोगे।
तुम्हारी चारू
चारू के लिखे पत्र को पढ़कर समीर बहुत देर तक किंकर्तव्यविमुढ़ पड़ा रहा, उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी शरीर की सारी ताकत एक साथ किसी ने निचोड़ ली थी, हिम्मत जुटा कर वह बगल की गुमटी पर से उसने एक विल्स लिया और उसे सुलगा लिया था, नथूनों से ढेर सारा धुंआ छोड़ते हुये बड़बड़ाया; पता नही ये लड़कियां हम मर्दों को पत्थर का समझना कब छोड़ेंगी जैसे हम मर्दों के अंदर दिल तो धड़कता ही नही, उसकी आंख भर आई थी लेकिन आंसू पलकों की कोर बाहर न आ सके।


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