जिन पर बचाने की जिम्मेदारी वही बने सौदागर
प़त्रकार, अधिकारी, राजनेता सब है विदेशी पक्षियों के मांस के शौकीन
अस्तित्वविहीन हो रहा सगड़ी का ताल सलोना
कभी पर्यावरण मंत्री ने देखा था पक्षी विहार बनाने का सपना
आजमगढ़। सगड़ी तहसील के आसपास के गांवों मे एक किस्सा मशहूर है अगर जाड़े में मेंहमानों की खातिरदारी में चिड़ियां नही खिलाये तो क्या खिलाये ? जी हां ललसर, टिकवा, न जाने कितने प्रकार के विदेशी पक्षी जिंदा ही केवल उनके पंख तोड़कर बेचे जाते हैं। पूरी रात जाल मे फंसे विदेशी मेहमान जिन्हे शिकारी फंदा कहते की दर्दभरी चीखों से ताल की नीरवता भंग होती रहती तब तक जब तक शिकारी उन्हे फंदे से निकाल उनके पंख तोड़ ठिकाने नही लगा देते। स्वाद व गर्म गोस्त और चंद सिक्कों की चाहत ने पूरे ताल सलोना की जैव विविधता को नष्ट करके रख दिया है अब विदेशी पक्षियों व विविध प्रकार की जीवों व वनस्पतियों की आरामगाह नही वरन शौकीनों की शिकारगाह बन गई है। यह वही स्थान है जिसकी जैविक विविधता को देखकर पूर्व पर्यावरण मंत्री स्व़ रामप्यारे सिंह ने इसे पक्षी विहार बनाने का सपना देखा था। उनकी बहु वंदना सिंह का पांच साल का विधायकी का कार्यकाल पूरा हुआ है वर्तमान में प्रदेश सरकार में उनकी पहुंच बहुत ऊपर तक मानी जाती है क्या वह अपने श्वसूर का सपना पूरा करेंगी, क्या राज्य सरकार एक पूर्व पर्यावरण मंत्री की सिफारिशों पर गौर करेगा यह कहानी आगे, पहले कराहते, घिघियाते रोते बिलखते ताल सलोना की वेदना सुन लेते हैं।
सगड़ी तहसील के पूरब में जीयनपुर बाजार से लगभग तीन किलोमीटर पूर्व कभी अजमतगढ़ स्टेट की मिल्कियत में शामिल ताल सलोना मखानों की खेती के लिये प्रसिद्ध था। प्राकृतिक आभा व पतित पावनी सरयू की अविरल धारा इस ताल सलोना को वर्ष भर जीवंत बनाये रखती थी। लगभग 977 एकड़ में फैले ताल के विस्तिृत भू भाग की खासीयत यह है कि यहां तिन्ना की पैदावार खूब होती जो एक प्रकार की घास है जिसके दाने विदेशी पक्षियों को खूब पसंद आते हैं। पर्याप्त मात्रा में मछलियां भी इस ताल की पहचान हैं तो इसके किनारे हजारों प्रकार की वनस्पतियां इसकी जैव विविधता की नैसर्गिकता को समृद्ध करती हैं। इतने विशाल ताल पर अजमतगढ़ स्टेट या यूं कहें कि ताल के आस-पास के गावों मल्लाहों का एकाधिकार रहा है। ताल के असली मालिक भी यही है यह ताल से मछलियों का शिकार करते हैं, मखानों की खेती करते है, तिन्ना चावल की पैदावार करते हैं और अपनी आजीविका चलाते हैं। उनके इस कार्य से ताल की जैव विविधता नष्ट होती है तो हो जैव विविधता से उनका क्या लेना देना ? वन विभाग उन्हे समझा भी नही पाता की शिकार का एक मानक है , पर्यावरण को बचाये रखना हम सबकी सामुहिक जिम्मेदारी भी है। मखानों की खेती, मछली का शिकार, तिन्नी का चावल उगाने से कोई उन्हे रोकता नही है और रोकना भी नही चाहिये। मेरा सवाल यह है कि अगर मल्लाह जिनकी आजीविका का साधन यह ताल है उनके उस ताल में विदेशी पक्षियों का शिकार कैसे हो जाता है और यह शिकार करने वाले कौन लोग हैं ? जवाब हम सबको पता है और यही सच भी है। जिनका जीवन ताल पर निर्भर है उन्ही में से कुछ लोग चंद सिक्कों की खातिर उनके ताल में प्रजनन करने, बच्चे पैदा करने आये विदेशी पक्षियों के सौदागर बन जाते हैं। क्योंकि बिना ताल में गये साइबेरियाई पक्षियों का शिकार हो ही नही सकता। ताल के बेताज बादशाह मल्लाह जाति के कुछ लोग सांझ ढले आठ दस नावों के साथ पूरे ताल मे, ताल के पानी से एक फिट पूरे ताल में बांस गाड़कर, बांसों में बांधकर एक फंदा लगाते हैं मच्छरदानी जैसा एक जाल जो पूरे ताल को इस पार से लेकर उस पार तक कवर करता है। यह जाल इतना बड़ा होता है कि एक बार कोई भी पक्षी तिन्ना खाने की गरज से नीचे उतरे तो जाल में फंसने से बच ही नही सकता। रात में ये शिकारी फंदा लगाकर घरो को लौट आते हैं और भोर मे पूनः नाव लेकर अपने फंदों की ओर बढ़ते और फंदे मेें फसे विदेशी पक्षियों को फंदे से निकालकर उनके पंख तोड़कर बोरों में भर जाता है। इस पूरे क्रिया कलाप में धुंध, कोहरा, कड़ाके की सर्द और वनविभाग का साधनहीन होना उनकी मदद करते है। सुबह के 8 बजते-बजते विदेशी सैलानियों को बेच दिया जाता है। 300 से लेकर 600 रूपया जोड़ा तक बोली लगती है। वन विभाग के पास न तो अपनी नाव है न बोट और न ही उनके खेवनहार उन्हे भी इन्ही शिकारियों के मदद से ताल में जाना पड़ता है। वन विभाग के सिपाही इन शिकारियों का कभी -कभी ताल के किनारे घात लगाकर इंतजार करते है और जब ये शिकारियों पक्षियों से भरे बोरे उतारते हैं तो पकड़े जाते है फिर शुरू होता है वही सदियों पूराना खेल। नतीजा शौकीन, अफसरों, नेताओ तक भी ये पक्षी उनकी थाली की शोभा बढ़ाने पहुंच जाते हैं वन विभाग की जेब गर्म होती है सो अलग। कोई कह सकता है कि इस बात का सबूत क्या है ? सबूत है वन विभाग द्वारा पकड़े जाने वाले शिकारी जो उसी जाति से आते हैं जिनकी ताल से आजीविका चलती है । अगर ऐसा नही है तो आखिर विदेशी पक्षियों का शिकार कैसे हो रहा है यह वन विभाग ही बता दे।
ताल सलोना पक्षी बिहार का अधूरा सपना
सगड़ी की राजनीति को प्रादेशिक शीर्ष तक पहुंचाने मंे जिस शख्सियत का नाम लिया जाता है वह हैं पूर्व पर्यावरण मंत्री स्वर्गीय रामप्यारे सिंह ! रामप्यारे सिंह जी ने ताल सलोना की जैव विविधता के महत्व को समझा था, उन्होने यह भी सोचा था कि कैसे ताल पर निर्भर हजारों की आबादी को रोजगार मुहैया कराते हुये ताल का सजग प्रहरी बनाया जाय। ताल सलोना पक्षी विहार के प्रोजेक्ट पर कागजी औपचारिकतायें पूरी हो चुकी थी पहल होना बाकी थी। कतिपय कारणों व समय के काल चक्र के कारण यह परियोजना कागजों में ही सिमटी रह गयी। पूर्व पर्यावरण मंत्री की विरासत संभाल रही उनकी पुत्रवधु वंदना सिंह सगड़ी क्षेत्र से विधायक रह चुकी हैं और वर्तमान प्रदेश सरकार में उनकी बातें सुनी भी जाती हैं। क्या वह अपने श्वसूर स्व. रामप्यारे सिंह के सपने को साकार करने के लिये कोई कदम उठाती हैं या पक्षी बिहार बनने का सपना महज कागजी ख्वाब बनकर रह जाता है।
ताल की बेशकीमती जमीन पर है भू मफियाओं की नजर
ताल सलोना अजमतगढ़ नगर पंचायत से प्रारम्भ होकर कई किलोमीटर तक सड़क के किनारे-किनारे गया है। ऐसे में कुछ भू माफिया सड़क के किनारेे के काश्तकारों से ताल की जमीन है पानी लगता है कह कर औने पौने दाम पर जमीने खरीद लेते हैं और रक्बा पूरा कराने के नाम पर ताल के अंदर तक अपना चक होने का पत्थर लगाये हुये हैं। ताल सलोना का रकबा राजस्व के नक्शे में जितना उतना बनाये रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है लेकिन जिम्मेदारी निभाता कौन है ? नतीजा ताल सलोना की प्राकृतिक व आर्थिक रूप से बेशकीमती जमीन पर भू माफिया नजर गड़ाये हुये हैं और कुछ हद तक कब्जा भी कर चुके हैं।
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