नेता जी को खोज रही निजामुद्दीन की आंखे


नेता जी को तलाश रहीं निजामुद्दीन की आखें
आजाद हिंद फौज में नेता जी  सुबाष चंद्र बोस के चालक की आप बीती
मुबारकपुर, आज़मगढ़ 21 जनवरी। देश की आज़ादी के लिये अपना सब कुछ निछावर कर देने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी नेता जी सुबाष चन्द्र बोस जिन्हें आज भी देश की करोड़ों आखें ढूढ़ रही है। वे आज भी जिन्दा है। यह अलग बात है कि हमारी निगाहें वहां तक नहीं पहुंच सकी हैं। यह कहना नेता जी के दाहिने बाजू, उनके अंगरक्षक एवं नेता जी के आज़ाद हिन्द फौज के कर्नल निज़ामुद्दीन उर्फ शैफुद्दीन शेख का जो मुबारकपुर थानान्तर्गत ग्राम ढकवा के एक मामूली घर में रहते हैं। जिनकी आयू इस समय लगभग 111 वर्ष से भी ऊपर हो चुकी है। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है अपितु आंखों देखा सच है किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हमारे ही देश ने आज तक इस सच्चाई को स्वीकार नहीं किया है। अन्यथा निजामुद्दीन को सरकारी सुविधायें उप्लब्ध होने के साथ ही उन्हे काफी पहले भारत-रत्न से सम्मानित किया जा चुका होता एवं उन्हें राष्ट्र धरोहर क रुप में सुरक्षा प्रदान की गयी होती। मगर इसे निजामुद्दीन या देश की बदनसीबी ही कही जा सकती है। इस दरोहर को आज तक एक फुटी कौड़ी भी नहीं दी गयी है।
उल्लेखनीय है कि निजामुद्दीन एवं नेता जी का साथ कोई एक-दो दिन का नहीं, अपितु पूरो 10 वर्षाें से भी अधिक समय तक नेता जी के आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण भाग बने रहे और विश्वसनीय अंगरक्षक के रुप में नेता जी की सभी गतिविधियों में शामिल रहे। यहां तक की नेता जी जब जर्मन तानाशाह हिटलर से भारत की आज़ादी के लिय सहयोग मांगने गये तब भी निजामुद्दीन उनके साथ थे। इसके अतिरिक्त कई एशियाई देश के सेनानायकों, शासकों एवं सुल्तानों जैसे रोमल एवं हिचीमैन आदि लोंगो से भी भेंटवार्ता में निजामुद्दीन नेता जी के साथ रहे। नेता जी अपनी फौज के सहयोग के लिये टोकियो, जापान, नागासाकी, हिरोशिमा, वियतनाम, थाईलैण्ड, कम्बोडिया, मलेशिया एवं सिंगापूर आदि जहां भी गये, एवं युद्व की गुप्त योजनायें बनाये निजामुद्दीन उनके साथ-साथ रहे। निजामुद्दीन के अनुसार चूंकि ब्रिटिश सेना पूरी दुनिया में नेता जी को ढ़ूढ़ती फिर रही थी। इस लिये वे अपनी ज्यादातर यात्रांयें जल मार्ग से पंडुब्बी द्वारा तय करते थे। आवश्यक्ता पड़ने पर जहरबारु देश के सुल्तान द्वारा भेंट की गयी लंक्वइन जफर नाम की बारह सिलेण्डरों वाली से भी चलते थे जिसका मैं चालक हुआ करता था। इसके साथ जापान द्वारा नेता जी को भेंट किये गये तीनों लड़ाकू विमानों का उप्योग करके अंग्रेजी सेना पर छापामार युद्व के तहत बमबारी किये जाते थे। जिसमें से एक विमान में मैं नेता जी के साथ हुआ करता था।
निजामुद्दीन आगे कहते हैं कि नेता जी को मुझपर इतना विश्वास था कि उनकी फौज में भर्ती होने के कुछ दिनों बाद मुझे अपने अंगरक्षक के रुप में चयनित कर लिया तो मैनंे आश्चर्य व्यक्त करते हुये यह कहा कि नेता जी मैं तो मुसलमान हूं फिर भी मुझपर इतना विश्वास क्यों? इसपर उन्होनें कहा कि तुमसे मुझे कोई खतरा नहीं है। डर तो मुझे अपनों से है। नेता जी को निजामुद्दीन के अलावा स्वामी नाम के एक मद्रासी व्यक्ति पर भी काफी विश्वास था और वह भी मेरी ही तरह नेता जी का दाहिना हाथ था। यद्यिपि नेता जी शुद्व शाकाहारी होने के साथ ही गम्भीर स्वभाव के थे और उनके अन्दर भेद भाव नाम की कोई चीज़ नहीं थी। वह सभी पर समभाव तथा समदृष्टि रखते थे। उनका माप सिर्फ एक था। देश प्रेम और देश प्रेमी।
1- निजामुद्दीन वैसे तो अंगूठा छाप थे किन्तु नेता जी के साथ रहते-रहते कई भाषाओं के जानकार बन गये और इसकी झलक आज भी उनके अन्दर देखने को मिल रही है। हिन्दी भाषा में बात करते-करते कभी अंग्रेजी तो कभी जापानी बोलने लगते हैं। जैसे कि वे आज भी युद्व सीमा पर खड़े हों।
2- निजामुद्दीन ने अपने जहन पर जोर देते हुये यह बताया कि नेता जी के आन्दोलन का युद्व पद्यति छापामार कार्यवाही पर निर्भर थी, चूंकि अंग्रेजी सेना के सामने महज पांच हजार आज़ाद हिन्द फौज के जवानों की सेना काफी कम थी। इस लिये हम मात्र छापेमार युद्व की कार्यवाही को अंजाम देते हुये अंग्रेजी सेना पर धावा बोलते थे और उन्हें जानी व माली नुकसान पहुंचाकर लुप्त हो जाते थे। हमारी इस रणनीति से अंग्रेजी सेना में भय व्याप्त रहता था।
3- सन् 1947 में अंग्रेजों के साथ होने वाले एक युद्व की यादें मुझे आज भी अच्छी तरह याद है जो मरते दम तक नहीं भूलेगी। यह लड़ाई इम्फाल स्थित मोरो नदी के तट पर लड़ी गयी थी। जिसमंें इस नदी के बर्मा तट पर हम लोग थे एवं इम्फाल के तट पर अंग्रेजी फौज थी। हथियार के नाम पर हमारे पास सिर्फ राइफलें एवं हथगोले थे जो युद्व के दौरान ही समाप्त हो गये। परन्तु हमारी फौज में इतना जोश था कि राइफलों में लगी संगीनों (बेनेट) को ही अपना हथियार बनाकर अन्तिम सांस तक लड़ते रहे। जिसमें काफी लोग मारे गये। सिर्फ मेरे सहित तीन लोग बचे थे और वह भी ऐसी सूरत में हम मुर्दा लाशों के साथ जिन्दा लाश बन गये और अंगे्रजी सेना हमें मृत समझकर वापस चली गयी। बाद में हम तीनों अपने आप को सुरक्षित किया जिसमें हमारे बचे हुये एक साथी का हाथ कट चुका था।
4- स्वंतत्रता संग्राम सेनानी शेख निजामुद्दीन ने नेता जी से अपने अन्तिम भेंट का उल्लेख करते हुये बताया कि 20 अगस्त 1947 को मेरे आखिरी मुलाकात वर्मा स्थित सीतांग नदी तट पर हुयी और उस समय नेता जी मुझसे मात्र इतना कहा कि अब देश आज़ाद हो चुका है। इस लिये आप जाइये और मैं कहीं और जा रहा हूं क्योंकि ब्रिटिश सरकार के शर्तनामें के अनुसार भारत सरकार को हमें गिरफ्तार कर अंग्रेजों को हमें सौंपना पडे़गा। यह बात सुनकर मैंने कहा कि मैं भी आपके साथ चलूंगा। इसपर नेता जी कहे कि आप जाइये और इस रहस्य को दबाये रखियेगा एवं देश की सेवा कीजियेगा। उनकी इस बात पर मैंने अपना सिर झुका दिया और भीगी आंखो से उन्हें एक स्टीमर पर बैठाया एवं चलते-चलते मैंने इतना जरुर कहा कि अगर मैं जिन्दा रहा तो आपके घर कोलकाता एक बार अवश्य आऊंगा। स्टीमर को आगे बढ़ते ही अंग्रेजी सेना द्वारा बमबारी शुरु हो गयी जिसमें नेता जी की गाड़ी ध्वस्त हो गयी एवं पोजिशन लेकर मैंने अपनी जान बचायी। यदि वही बमबारी चन्द मिनट पहले होती तो शायद नजारा कुछ और होता। परन्तु कुछ समय बाद मेरे वायरलेस पर नेता जी ने यह कहा कि हम नदी पार आ गये हैं और नेता जी थाईलैण्ड की तरफ चले गये। उसके बाद मैंने अपने सभी सैनिक रिकाडऱ् जलाकर नष्ठ कर दिया और एक आम आदमी की तरह अपने ससुर अब्दुल शकूर के पास वर्मा चला गया औ फिर मैं एक चाइनीज़ बैंक की गाड़ी चलाने लगा।
5- नेता जी से किये गये वादे के अनुसार 1950 ई0 में मैं रंगून से हवाई जहाज द्वारा दमदम हवाई अड्डा पहुंचा एवं कोलकाता स्थ्ति उनके आवास तक गया और अपनी तरीके से नेता जी को ढं़ूढ़ने का अथक प्रयास किया परन्तु निराशा हाथ लगी। इस लिये मैं वहीं से फिर वर्मा वापस चला गया तथा पांच जून 1969 ई0 को अपने पूरे परिवार सहित अपने पैतृक गांव ढकवां चला आया एवं गुप्त तरीके से जीवन यापन करने लगा। सन् 2000 ई0 में जब भारत एवं ब्रिटिश समझौता टूट गया तब मैंने 2001 ई0 में मीडिया के सामने अपनी मौजूदगी को जाहिर किया। किन्तु 12 वर्ष बीत जाने पर भी मेरी यह असलियत भारत सरकार के हलक के नीचे नहीं उतरी है।
जनसंदेश टाईम्स संवाद्दाता द्वारा पूछे गये एक सवाल के जवाब में निजामुद्दीन ने पीडि़त अन्दाज में कहा कि आज के नेताओं और हमारे नेता जी से कोई तुलना नहीं है। देश को आज़ाद कराने नेता जी के दौर मंे देश निर्माण की ओर अग्रसर था परन्तु आज के दौर में देश विनाश की ओर अग्रसर है। यह पूछने पर कि क्या नेता जी अभी जीवित हैं? इसपर उन्होेंने कहा कि मेरी अन्तरआत्मा आज भी यही कहती है कि नेता जी आज भी मेरी तरह जीवित हैं, वैसे तो वे अमर हैं। एक ऐतिहासिक बात यह भी बतायी कि उन्होंने आज़ादी की जंग के दौरान वर्मा में स्थित बहादुर शाह जफर के मकबरे को नेता जी ने ही पक्का कराया था एवं वहीं के जुब्ली हाल में आयोजित एक विशेष सभा में लोंगो ने नेता जी को सोने से तौला था।
जीवन परिचय
निजामुद्दीन उर्फ सैफुद्दीन शेख का जन्म सन् 1901 ई0 में मुबारकपुर थानान्र्तगत ढकवां गांव में हुआ था जिनकी उम्र आज 111 वर्ष से ऊपर हो चुकी है। इनके पिता का नाम इमाम अली था जो सिंगापूर में एक कैन्टीन चलाते थे और इनकी माता का नाम मुसलमां खातून था। इनके पांच भाई-बहन हैं। भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं तथा इनके दो भाई मु0 इजहार व मु0 इसमाईल तथा बहनें घूरा व सुग्गड़ थीं। जो अब इस दुनिया में नहीं है। इनकी पत्नि का नाम अजबुन्निसा है, जो आज 101 वर्ष की हो चुकी हैं। इनके एक पुत्री हबीबुन्निसा 85 वर्ष तथा पुत्र अख्तर अली 72 वर्ष, अनवर अली 65 वर्ष तथा शेख अकरम 55 वर्ष के हैं। यह अपनें छोटे पुत्र शेख अकरम के साथ अपने पैतृक निवास ढकवां में जीवन यापन कर रहे हैं।
इन्होनें बताया कि जब मैं लगभग 24-25 वर्ष का था तब मैं अपनी मां को बिना बताये घर से भागकर सिंगापूर अपनें पिता के पास चला गया तथा कैन्टीन पर काम करने लगा। चन्द दिनों बाद नेता जी सुबास चन्द्र बोस द्वारा आजाद हिन्द फौज नौजवानों की सिंगापूर में भर्ती चल रही थी और मैं भी उसी मंे भर्ती हो गया और उसके बाद से नेता जी के साथ रह कर सैंकड़ों सभाओं एवं गुप्त योजनाओं एवं एशियाई देशों के आवागमन और लड़ी गयी लड़ाइयों में साथ-साथ अंगरक्षक एवं चालक के रुप में रहा। 20 अगस्त 1947 ई0 मेरी नेता जी से आखिरी मुलाका स्थ्ति सीतांग नदी तट पर थी जहां से नेता जी स्टीमर द्वारा नदी पार कर थाईलैण्ड की तरफ चले गये और मैं अपने सैनिक दस्तावेज जला कर अपने ससुर के पास वर्मा चला गया। इसी बीच (1950) में कोलकाता जाकर मैंने नेता जी को तलाशने का प्रयास किया परन्तु निराशा हाथ लगने के बाद 5 जून 1969 ई0 में अपनें परिवार के साथ ढकवां चला आया और तभी से यहीं हूं

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